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Gourav Kumar
sabko hairaan kar jaaunga
sabko hairaan kar jaaunga | सब को हैराँ कर जाऊँगा
- Gourav Kumar
सब
को
हैराँ
कर
जाऊँगा
वक़्त
से
पहले
मर
जाऊँगा
पंछी
फ़लक
को
निकल
गए
हैं
और
मैं
फिर
दफ़्तर
जाऊँगा
दरियाओं
का
दावा
कब
है
दो
आँखें
तो
भर
जाऊँगा
अगली
बार
मैं
उस
सेे
मिलने
ख़ुद
को
भी
ले
कर
जाऊँगा
ख़ूब
हँसूँगा
ऊपर
ऊपर
अंदर
अंदर
डर
जाऊँगा
इक
दिन
छुट्टी
मिल
जाएगी
इक
दिन
मैं
भी
घर
जाऊँगा
आपको
ज़हमत
कुछ
नइँ
होगी
मैं
चुपचाप
बिखर
जाऊँगा
- Gourav Kumar
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मेरे
ही
संग-ओ-ख़िश्त
से
तामीर-ए-बाम-ओ-दर
मेरे
ही
घर
को
शहर
में
शामिल
कहा
न
जाए
Majrooh Sultanpuri
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माँ
मुझे
देख
के
नाराज़
न
हो
जाए
कहीं
सर
पे
आँचल
नहीं
होता
है
तो
डर
होता
है
Anjum Rehbar
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हम
मिल
के
आ
गए
मगर
अच्छा
नहीं
लगा
फिर
यूँँ
हुआ
असर
कि
घर
अच्छा
नहीं
लगा
इक
बार
दिल
में
तुझ
सेे
जुदाई
का
डर
बना
फिर
दूसरा
कोई
भी
डर
अच्छा
नहीं
लगा
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Shriyansh Qaabiz
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सब
ने
माना
मरने
वाला
दहशत-गर्द
और
क़ातिल
था
माँ
ने
फिर
भी
क़ब्र
पे
उस
की
राज-दुलारा
लिक्खा
था
Ahmad Salman
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रातें
किसी
याद
में
कटती
हैं
और
दिन
दफ़्तर
खा
जाता
है
दिल
जीने
पर
माएल
होता
है
तो
मौत
का
डर
खा
जाता
है
सच
पूछो
तो
'तहज़ीब
हाफ़ी'
मैं
ऐसे
दोस्त
से
आज़िज़
हूँ
मिलता
है
तो
बात
नहीं
करता
और
फोन
पे
सर
खा
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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इस
दर
का
हो
या
उस
दर
का
हर
पत्थर
पत्थर
है
लेकिन
कुछ
ने
मेरा
सर
फोड़ा
हैं
कुछ
पर
मैं
ने
सर
फोड़ा
है
Zubair Ali Tabish
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अब
तो
उस
सूने
माथे
पर
कोरेपन
की
चादर
है
अम्मा
जी
की
सारी
सजधज,
सब
ज़ेवर
थे
बाबूजी
कभी
बड़ा
सा
हाथ
ख़र्च
थे
कभी
हथेली
की
सूजन
मेरे
मन
का
आधा
साहस,
आधा
डर
थे
बाबूजी
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Aalok Shrivastav
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हमीं
को
क़ातिल
कहेगी
दुनिया
हमारा
ही
क़त्ल-ए-आम
होगा
हमीं
कुएँ
खोदते
फिरेंगे
हमीं
पे
पानी
हराम
होगा
अगर
यही
ज़ेहनियत
रही
तो
मुझे
ये
डर
है
कि
इस
सदी
में
न
कोई
अब्दुल
हमीद
होगा
न
कोई
अब्दुल
कलाम
होगा
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Meraj Faizabadi
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ज़ात
दर
ज़ात
हम
सेफ़र
रहकर
अजनबी
अजनबी
को
भूल
गया
Jaun Elia
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हुस्न
ने
शौक़
के
हंगा
में
तो
देखे
थे
बहुत
इश्क़
के
दावा-ए-तक़दीस
से
डर
जाना
था
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Asrar Ul Haq Majaz
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समुंदर
में
वो
गहराई
नहीं
है
मैं
जितना
डूब
जाना
चाहता
हूँ
Gourav Kumar
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मुझे
लगा
था
उम्र
भर
का
इंतिज़ाम
हो
गया
तुम्हारा
ग़म
तो
चार
दिन
में
ही
तमाम
हो
गया
नज़र
से
इश्क़
की
परत
हटी
तो
एक
पल
में
ही
वो
रंग
रूप
ढल
गए
वो
शख़्स
आम
हो
गया
तुझे
थी
इश्क़
से
ग़रज़
मुझे
ग़ज़ल
की
भूख
थी
तेरा
भी
काम
हो
गया
मेरा
भी
काम
हो
गया
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Gourav Kumar
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एक
बदन
इक
जान
है
घर
में
इतना
सा
सामान
है
घर
में
आँख
मिलाते
डर
लगता
है
हर
चेहरा
अनजान
है
घर
में
दफ़्न
किए
सब
ख़्वाब
यहीं
पर
अपना
क़ब्रिस्तान
है
घर
में
नगरी
नगरी
घूमने
वाले
कोई
बहुत
हलकान
है
घर
में
क्यूँँ
दुनिया
की
क़ैद
में
आएँ
अच्छा
सा
ज़िंदान
है
घर
में
जग
को
समझ
न
आने
वाले
तू
कितना
आसान
है
घर
में
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Gourav Kumar
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गरचे
इस
ने
ज़ख़्म
दिया
है
गहरा
तुम
से
दूसरा
शिकवा
दुनिया
से
है
पहला
तुम
से
Gourav Kumar
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माँ
की
सूरत
सामने
आती
रही
ख़ुद-कुशी
का
फ़ैसला
टलता
रहा
Gourav Kumar
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