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gabruu govind
ai mirii jaañ mahjabeen chaahaton pe kar yaqeen
ai mirii jaañ mahjabeen chaahaton pe kar yaqeen | ऐ मिरी जाँ महजबीं चाहतों पे कर यक़ीन
- gabruu govind
ऐ
मिरी
जाँ
महजबीं
चाहतों
पे
कर
यक़ीन
वस्ल
की
शब
छोड़
दे
हँस
के
कर
तू
दिन
हसीन
इतना
मैं
क़ाबिल
नहीं
बात
कर
लूँ
इश्क़
की
जिस्म
भर
के
है
हया
इश्क़
है
पर्दा-नशीन
दर-ब-दर
मैं
फिर
रहा
इक
वतन
ही
दिख
रहा
एक
शाइर
हूँ
मैं
तू
आशिक़ी
की
सर-ज़मीन
बोलता
दिल
जब
मिरा
बस
यही
तो
कहता
है
तू
ही
सब
सेे
नाज़नीं
तू
ही
सब
सेे
बेहतरीन
- gabruu govind
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ख़ुद
को
तन्हा
पाओगे
जब
इश्क़
तुम्हें
हो
जाएगा
जीते
जी
मर
जाओगे
जब
इश्क़
तुम्हें
हो
जाएगा
तुम
मजनूँ
सा
रक़्स
करोगे
और
फ़रहाद
सा
पागलपन
तुम
'आशिक़
कहलाओगे
जब
इश्क़
तुम्हें
हो
जाएगा
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gabruu govind
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मुझे
तुम्हें
मिले
से
मिलने
का
ख़याल
ठीक
है
है
क्या
कि
क्या
पता
नहीं
मगर
मलाल
ठीक
है
फ़कत
मैं
क्यूँँ
ही
चाहता
हूँ
तुम
को
और
किस
लिए
हक़ीक़तें
पता
लगें
तो
फिर
सवाल
ठीक
है
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gabruu govind
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मेरे
दुख
का
सबब
कुछ
और
ही
है
कुछ
और
था
पहले
अब
कुछ
और
ही
है
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अब
न
कोई
तिरे
हू-ब-हू
चाहिए
कुल
मिला
के
हमें
सिर्फ़
तू
चाहिए
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किसी
को
भूलना
जब
भूल
जाते
हैं
दिवाने
रस्सियों
से
झूल
जाते
हैं
डरी
सहमी
नज़र
से
देखता
हैं
ख़ार
निकल
के
सामने
जब
फूल
जाते
हैं
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