ग़ज़लों में अब वो रंग न रा'नाई रह गई

  - Farooq Shamim
ग़ज़लोंमेंअबवोरंगरा'नाईरहगई
कुछरहगईतोक़ाफ़िया-पैमाईरहगई
लफ़्ज़ोंकायेहिसारबुलंदीछूसका
यूँँभीमिरेख़यालकीगहराईरहगई
क्यासोचिएकिरिश्ता-ए-दीवारक्याहुआ
धूपोंसेअबजोमारका-आराईरहगई
कबजानेसाथछोड़देंदिलकीयेधड़कनें
हरवक़्तसोचतीयहीतन्हाईरहगई
अपनेहीफ़नकीआगमेंजलतेरहे'शमीम'
होंटोंपेसबकेहौसला-अफ़ज़ाईरहगई
  - Farooq Shamim
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