रह-ए-ख़िज़ाँमेंतलाश-ए-बहारकरतेरहे
शब-ए-सियहसेतलबहुस्न-ए-यारकरतेरहे
ख़याल-ए-यारकभीज़िक्र-ए-यारकरतेरहे
इसीमताअ'पेहमरोज़गारकरतेरहे
नहींशिकायत-ए-हिज्राँकिइसवसीलेसे
हमउनसेरिश्ता-ए-दिलउस्तुवारकरतेरहे
वोदिनकिकोईभीजबवज्ह-ए-इन्तिज़ारनथी
हमउनमेंतेरासिवाइंतिज़ारकरतेरहे
हमअपनेराज़पेनाज़ाँथेशर्मसारनथे
हरएकसेसुख़न-ए-राज़-दारकरतेरहे
ज़िया-ए-बज़्म-ए-जहाँबारबारमांदहुई
हदीस-ए-शोला-रुख़ाँबारबारकरतेरहे
उन्हींकेफ़ैज़सेबाज़ार-ए-अक़्लरौशनहै
जोगाहगाहजुनूँइख़्तियारकरतेरहे