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Faisal Hashmi
door tak phaile hue ek ghane jungle men
door tak phaile hue ek ghane jungle men | दूर तक फैले हुए एक घने जंगल में
- Faisal Hashmi
दूर
तक
फैले
हुए
एक
घने
जंगल
में
दो-शजर
खींच
के
सायों
को
जहाँ
मिलते
हैं
इस
जगह
धूप
भी
सूरज
से
मिला
करती
है
ओढ़
कर
शाम
की
फूलों-भरी
चादर
अक्सर
जैसे
दो
शख़्स
बिछड़ने
के
लिए
मिलते
हैं
- Faisal Hashmi
मत
पूछो
कितना
ग़मगीं
हूँ
गंगा
जी
और
जमुना
जी
ज़्यादा
तुमको
याद
नहीं
हूँ
गंगा
जी
और
जमुना
जी
अमरोहे
में
बान
नदी
के
पास
जो
लड़का
रहता
था
अब
वो
कहाँ
है
मैं
तो
वहीं
हूँ
गंगा
जी
और
जमुना
जी
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Jaun Elia
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फ़ातिहा
पढ़
कि
फूल
रख
मुझ
पर
आ
गया
है
तो
कुछ
जता
अफ़सोस
Siraj Faisal Khan
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जलाने
वाले
जलाते
ही
हैं
चराग़
आख़िर
ये
क्या
कहा
कि
हवा
तेज़
है
ज़माने
की
Jameel Mazhari
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इसे
तो
वक़्त
की
आब-ओ-हवा
ही
ठीक
कर
देगी
मियाँ
नासूर
होते
ज़ख़्म
सहलाया
नहीं
करते
shaan manral
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मैं
जिसे
ओढ़ता
बिछाता
हूँ
वो
ग़ज़ल
आप
को
सुनाता
हूँ
एक
जंगल
है
तेरी
आँखों
में
मैं
जहाँ
राह
भूल
जाता
हूँ
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Dushyant Kumar
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जाने
किस
किस
का
ख़याल
आया
है
इस
समुंदर
में
उबाल
आया
है
एक
बच्चा
था
हवा
का
झोंका
साफ़
पानी
को
खंगाल
आया
है
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Dushyant Kumar
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गुलाब
टहनी
से
टूटा
ज़मीन
पर
न
गिरा
करिश्में
तेज़
हवा
के
समझ
से
बाहर
हैं
Shahryar
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मुझे
भी
बख़्श
दे
लहजे
की
ख़ुशबयानी
सब
तेरे
असर
में
हैं
अल्फ़ाज़
सब,
म'आनी
सब
मेरे
बदन
को
खिलाती
है
फूल
की
मानिंद
कि
उस
निगाह
में
है
धूप,
छाँव,
पानी
सब
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Subhan Asad
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रो
रहा
था
गोद
में
अम्माँ
की
इक
तिफ़्ल-ए-हसीं
इस
तरह
पलकों
पे
आँसू
हो
रहे
थे
बे-क़रार
जैसे
दीवाली
की
शब
हल्की
हवा
के
सामने
गाँव
की
नीची
मुंडेरों
पर
चराग़ों
की
क़तार
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Ehsan Danish
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पूरी
कायनात
में
एक
क़ातिल
बीमारी
की
हवा
हो
गई
वक़्त
ने
कैसा
सितम
ढाया
कि
दूरियाँ
ही
दवा
हो
गईं
Unknown
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जब
ख़ाक
उड़ाता
हुआ
नींदों
का
सफ़र
हो
फिर
क्यूँ
न
किसी
और
ही
दुनिया
से
गुज़र
हो
वो
मेरे
बराबर
से
निकल
आया
था
वर्ना
दीवार
न
थी
ऐसी
कि
जिस
में
कोई
दर
हो
मैं
जिस्म
से
गुज़रा
हूँ
यही
सोच
के
अक्सर
शायद
कि
तिरी
रूह
का
इस
राह
में
घर
हो
ये
कैसी
तमन्ना
है
कि
इस
दश्त
में
'फ़ैसल'
दरिया
हो
किनारा
हो
सफ़ीना
हो
भँवर
हो
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Faisal Hashmi
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