in uja | इन उजड़ी बस्तियों का कोई तो निशाँ रहे

  - Ezaz Ahmad Azar
इनउजड़ीबस्तियोंकाकोईतोनिशाँरहे
चूल्हेजलेंकिघरहीजलेंपरधुआँरहे
नेरोनेबंसरीकीनईतानछेड़दी
अबरोमकानसीबफ़क़तदास्ताँरहे
पानीसमुंदरोंकाछलनीसेमापिये
ऐसाहोकिसाराकियाराएगाँरहे
मुझकोसुपुर्द-ए-ख़ाककरोइसदु'आकेसाथ
आँगनमेंफूलखिलतेरहेंऔरमकाँरहे
काटीहैउम्ररातकीपहनाइयोंकेसाथ
हमशहर-ए-बे-चराग़मेंबे-कसाँरहे
'आज़र'हरएकगामपेकाटाहैसंग-ए-जब्र
हाथोंमेंतेशासामनेकोह-ए-गिराँरहे
  - Ezaz Ahmad Azar
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