kitnii door se chalte chalte khwaab-nagar tak aayi hooñ | कितनी दूर से चलते चलते ख़्वाब-नगर तक आई हूँ

  - Erum Zehra
कितनीदूरसेचलतेचलतेख़्वाब-नगरतकआईहूँ
पाँवमेंमैंछालेसहकरअपनेघरतकआईहूँ
कालीरातकेसन्नाटेकोमैंनेपीछेछोड़दिया
शब-भरतारेगिनतेगिनतेदेखसहरतकआईहूँ
लिखतेलिखतेलफ़्ज़ोंसेमेरीभीकुछपहचानहुई
सारीउम्रकीपूँजीलेकरआजहुनरतकआईहूँ
शायदवोमिट्टीसेकोईतेरीशक्लबनापाए
तेरेख़द्द-ओ-ख़ालबतानेकूज़ा-गरतकआईहूँ
सूरजकीशिद्दतनेमुझकोकितनाहैबेहालकिया
धूपकीचादरओढ़केसरपेएकशजरतकआईहूँ
बाबुलकेआँगनसेइकदिनहरबेटीकोजानाहै
आँखोंमेंनएख़्वाबसजाकरतेरेदरतकआईहूँ
अपनेहाथमेंइल्मकीशम्अ''इरम'नेथा
मेंरक्खीहै
मैंतोएकउजालालेकरदीदा-वरतकआईहूँ
  - Erum Zehra
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