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Eruj Mubarak
raat bhar
raat bhar | रात भर
- Eruj Mubarak
रात
भर
ख़्वाब
अंदर
आप
अपने
को
बंद
कमरे
के
कोने
में
नुक़्ता-ए-आग़ाज़
से
जुड़ा
ठंडे
सीम-ज़दा
फ़र्श
पर
हालत-ए-तशन्नुज
और
नज़्अ'
दरमियान
रौशनी
इंतिज़ार
में
देखा
बाँग
बे-वक़्त
ख़्वाब
टूटने
पर
शोशे
के
फ़र्क़
से
ख़्वाब
की
ता'बीर
को
सच
पाया
अपने
आप
को
अपने
वतन
में
पाया
- Eruj Mubarak
तुम
भला
उस
प्रेम
की
गहराई
क्या
समझोगे
जानाँ
जो
कभी
ख़्वाबों
में
भी
अपनी
न
सरहद
लाँघता
है
Harsh saxena
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कहीं
से
दुख
तो
कहीं
से
घुटन
उठा
लाए
कहाँ-कहाँ
से
न
दीवानापन
उठा
लाए
अजीब
ख़्वाब
था
देखा
के
दर-ब-दर
हो
कर
हम
अपने
मुल्क
से
अपना
वतन
उठा
लाए
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Farhat Abbas Shah
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ज़हर
खा
खा
कर
गुज़ारा
कर
रहे
हैं
आजकल
ज़िंदगी
तुझ
सेे
किनारा
कर
रहे
हैं
आजकल
तू
बहुत
ही
दिलनशीं
है,
महजबीं
है
तू
मगर
तुझको
अपनाकर
ख़सारा
कर
रहे
हैं
आजकल
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Hameed Sarwar Bahraichi
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लो
चाँद
हो
गया
नमू
माह-ए-ख़राम
का
ऐ
मोमिनों
लिबास-ए-सियाह
ज़ेब-ए-तन
करो
फ़र्श-ए-अज़ा
बिछा
के
अज़ाख़ाने
में
शजर
अब
सुब्ह-ओ-शाम
ज़िक्र-ए-ग़रीब-उल-वतन
करो
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Shajar Abbas
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बहुत
मुश्किल
है
कोई
यूँँ
वतन
की
जान
हो
जाए
तुम्हें
फैला
दिया
जाए
तो
हिन्दुस्तान
हो
जाए
Kumar Vishwas
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शब
के
सन्नाटे
में
ये
किस
का
लहू
गाता
है
सरहद-ए-दर्द
से
ये
किस
की
सदा
आती
है
Ali Sardar Jafri
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सियाह
रात
की
सरहद
के
पार
ले
गया
है
अजीब
ख़्वाब
था
आँखें
उतार
ले
गया
है
है
अब
जो
ख़ल्क़
में
मजनूँ
के
नाम
से
मशहूर
वो
मेरी
ज़ात
से
वहशत
उधार
ले
गया
है
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Abhishek shukla
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तुम
ने
किया
है
तुम
ने
इशारा
बहुत
ग़लत
दरिया
बहुत
दुरुस्त
किनारा
बहुत
ग़लत
Nabeel Ahmed Nabeel
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पारा-ए-दिल
है
वतन
की
सर
ज़मीं
मुश्किल
ये
है
शहर
को
वीरान
या
इस
दिल
को
वीराना
कहें
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Majrooh Sultanpuri
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प्यार
करने
की
हिम्मत
नहीं
उनके
पास
और
हम
सेे
किनारा
भी
होता
नहीं
बात
सीधे
कही
भी
नहीं
जा
रही
और
कोई
इशारा
भी
होता
नहीं
उसको
उम्मीद
है
ऐश
होगी
बसर
साथ
में
जब
रहेगी
मिरे
वो
मगर
मुझपे
जितनी
मुहब्बत
बची
है
सखी
इतने
में
तो
गुज़ारा
भी
होता
नहीं
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Divyansh "Dard" Akbarabadi
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