ai mire shehr-e-ishq tira kaisa bakht hai | ऐ मेरे शहर-ए-इश्क़ तिरा कैसा बख़्त है

  - Ehsaan Ghaman
मेरेशहर-ए-इश्क़तिराकैसाबख़्तहै
मैंजिसकोदेखताहूँवहीलख़्तलख़्तहै
ख़ुशहोरहाहूँइसलिएमिट्टीपेबैठकर
यारोयहीज़मीनमिरापहलातख़्तहै
छाँवकीजुस्तुजूभीकहाँलेकेगई
सहरासेपूछताहूँकहींपरदरख़्तहै
दुनियामिरेमिज़ाजकोसमझीनहींअभी
शायदइसीलिएमेरालहजाकरख़्तहै
इकपलमेंकैसेनिकलूँमैंदुनियासमेटकर
सारीज़मींपेबिखराहुआमेरारख़्तहै
'एहसान'वोतोफूलसेनाज़ुकलगामुझे
मैंतोसमझरहाथावोपत्थरसेसख़्तहै
  - Ehsaan Ghaman
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