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Dhruv Gupt
tanhaa manzar hain to kya
tanhaa manzar hain to kya | तन्हा मंज़र हैं तो क्या
- Dhruv Gupt
तन्हा
मंज़र
हैं
तो
क्या
सात
समुंदर
हैं
तो
क्या
ज़रा
सिकुड़
के
सो
लेंगे
छोटी
चादर
है
तो
क्या
चाँद
सुकूँ
तो
देता
है
ज़द
से
बाहर
है
तो
क्या
हम
भी
शीशे
के
न
हुए
हर
सू
पत्थर
हैं
तो
क्या
हम
सा
दिल
ले
कर
आओ
जिस्म
बराबर
है
तो
क्या
बिजली
सब
पर
गिरती
है
मेरा
ही
घर
है
तो
क्या
डगर
डगर
भटकाती
है
दिल
के
अंदर
है
तो
क्या
- Dhruv Gupt
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हवा
चली
तो
उसकी
शॉल
मेरी
छत
पे
आ
गिरी
ये
उस
बदन
के
साथ
मेरा
पहला
राब्ता
हुआ
Zia Mazkoor
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बारिशें
जाड़े
की
और
तन्हा
बहुत
मेरा
किसान
जिस्म
और
इकलौता
कंबल
भीगता
है
साथ-साथ
Parveen Shakir
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तुम्हें
ज़रूर
कोई
चाहतों
से
देखेगा
मगर
वो
आँखें
हमारी
कहाँ
से
लाएगा
तुम्हारे
साथ
ये
मौसम
फ़रिश्तों
जैसा
है
तुम्हारे
बा'द
ये
मौसम
बहुत
सताएगा
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Bashir Badr
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मौत
के
साथ
हुई
है
मिरी
शादी
सो
'ज़फ़र'
उम्र
के
आख़िरी
लम्हात
में
दूल्हा
हुआ
मैं
Zafar Iqbal
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दिल
बना
दोस्त
तो
क्या
क्या
न
सितम
उस
ने
किए
हम
भी
नादां
थे
निभाते
रहे
नादान
के
साथ
Shakeel Badayuni
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बे-सबब
मरने
से
अच्छा
है
कि
हो
कोई
सबब
दोस्तों
सिगरेट
पियो
मय-ख़्वारियाँ
करते
रहो
Ameer Imam
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ख़मोश
झील
के
पानी
में
वो
उदासी
थी
कि
दिल
भी
डूब
गया
रात
माहताब
के
साथ
Rehman Faris
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राब्ता
लाख
सही
क़ाफ़िला-सालार
के
साथ
हम
को
चलना
है
मगर
वक़्त
की
रफ़्तार
के
साथ
Qateel Shifai
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हमेशा
साथ
सबके
तो
ख़ुदा
भी
रह
नहीं
सकता
बनाकर
औरतें
उसने
ज़मीं
को
यूँँ
किया
जन्नत
Anukriti 'Tabassum'
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जब
तक
जला
ये
हम
भी
जले
इसके
साथ
साथ
जब
बुझ
गया
चराग़
तो
सोना
पड़े
हमें
Abbas Qamar
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कुछ
दहशत
हर
बार
ख़रीदा
जब
हम
ने
अख़बार
ख़रीदा
सच
पे
सौ
सौ
पर्दे
डाले
सपना
इक
बीमार
ख़रीदा
उस
के
भीतर
भी
जंगल
था
कल
जिस
ने
घर-बार
ख़रीदा
एक
मुश्त
में
दिल
दे
आया
टुकड़ा
टुकड़ा
प्यार
ख़रीदा
भोली
सी
मुस्कान
की
ख़ातिर
कितना
कुछ
बे-कार
ख़रीदा
हम
बे-मोल
लुटा
देते
हैं
तुम
ने
जो
हर
बार
ख़रीदा
प्यार
से
भी
हम
मर
जाते
हैं
आप
ने
क्यूँँ
हथियार
ख़रीदा
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Dhruv Gupt
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मेरी
आँखों
में
ये
ख़ला
क्या
है
तू
अगर
साथ
है
जुदा
क्या
है
मैं
जो
अपनी
तरह
नहीं
लगता
तुम
से
मिल
कर
मुझे
हुआ
क्या
है
दर्ज
इस
में
हैं
ख़्वाहिशें
सब
की
मेरे
चेहरे
में
अब
मिरा
क्या
है
मेरे
हर
नक़्श
का
पता
है
उसे
आइना
मुझ
को
जानता
क्या
है
रास्ते
की
तलाश
है
सब
को
अब
सिवा
इस
के
रास्ता
क्या
है
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हर
तरफ़
तेज़
आँधियाँ
रखना
बीच
में
मेरा
आशियाँ
रखना
धूप
छत
पर
हवा
हो
कमरे
में
लॉन
में
शोख़
तितलियाँ
रखना
चाँद
बरसे
तसल्लियों
की
तरह
घर
में
दो-चार
खिड़कियाँ
रखना
अपनी
दुनिया
है
दिल-फ़रेब
बहुत
एक
दिल
को
कहाँ
कहाँ
रखना
तू
रहेगा
जहाँ
ज़मीं
है
तिरी
मैं
जहाँ
हूँ
मुझे
वहाँ
रखना
लफ़्ज़
मिल
जाएँ
तो
बयाँ
होगा
होंट
काँपे
तो
उँगलियाँ
रखना
बाँह
फैले
तो
तुम
को
छू
आए
फ़ासला
इतना
दरमियाँ
रखना
मेरे
लफ़्ज़ों
में
दर्द
दे
यारब
मेरे
मुँह
में
मिरी
ज़बाँ
रखना
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हैं
हवाओं
में
तल्ख़ियाँ
शायद
आँधियों
में
हो
कुछ
बयाँ
शायद
लफ़्ज़
खो
आए
हैं
सभी
मा'नी
बात
कह
दें
ख़मोशियाँ
शायद
कितनी
गहरी
उदासियाँ
हैं
अभी
नींद
कुछ
दे
तसल्लियाँ
शायद
घर
में
जिस्मों
की
आँच
बाक़ी
है
आज
उजड़ा
है
आशियाँ
शायद
उस
जगह
हर
कोई
अकेला
है
जिस
जगह
हैं
बुलंदियाँ
शायद
बच्चे
उलझे
हैं
सब
किताबों
में
मुंतज़िर
होंगी
तितलियाँ
शायद
रब
है
ऊपर
ज़मीन
पर
दुनिया
बीच
में
है
बहुत
धुआँ
शायद
ख़त
लिखेंगे
उन्हें
सलीक़े
से
आज
काँपेंगी
उँगलियाँ
शायद
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Dhruv Gupt
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एक
भटकी
सदा
सा
रहता
हूँ
आज-कल
बे-पता
सा
रहता
हूँ
घर
मिरे
दिल
में
भी
रहा
न
कभी
घर
में
मैं
भी
ज़रा
सा
रहता
हूँ
चाँद
से
रोज़
आँख
लड़ती
है
मैं
भी
छत
पे
पड़ा
सा
रहता
हूँ
कोई
पूछो
तो
मुद्दआ'
क्या
है
मैं
जो
सब
से
ख़फ़ा
सा
रहता
हूँ
कर
सको
तो
मिरी
तलाश
करो
इन
दिनों
मैं
हवा
सा
रहता
हूँ
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