zaraa nigaah uthao ki gham ki raat kate | ज़रा निगाह उठाओ कि ग़म की रात कटे

  - Davarka Das Shola
ज़रानिगाहउठाओकिग़मकीरातकटे
नज़रनज़रसेमिलाओकिग़मकीरातकटे
अबगएहोतोमेरेक़रीबबैठो
दुईकेनक़्शमिटाओकिग़मकीरातकटे
शब-ए-फ़िराक़हैशम-ए-उमीदलेआओ
कोईचराग़जलाओकिग़मकीरातकटे
कहाँहैंसाक़ी-ओ-मुत्रिबकहाँहैपीर-ए-हरम
कहाँहैंसबयेबुलाओकिग़मकीरातकटे
कहाँहोमय-कदेवालोज़राइधरआओ
हमेंभीआजपिलाओकिग़मकीरातकटे
नहींकुछऔरजोमुमकिनतोयार'शोला'की
कोईग़ज़लहीसुनाओकिग़मकीरातकटे
  - Davarka Das Shola
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