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Dagh Dehlvi
ab to bimaar-e-mohabbat tere
ab to bimaar-e-mohabbat tere | अब तो बीमार-ए-मोहब्बत तेरे
- Dagh Dehlvi
अब
तो
बीमार-ए-मोहब्बत
तेरे
क़ाबिल-ए-ग़ौर
हुए
जाते
हैं
- Dagh Dehlvi
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आरज़ू
है
वफ़ा
करे
कोई
जी
न
चाहे
तो
क्या
करे
कोई
गर
मरज़
हो
दवा
करे
कोई
मरने
वाले
का
क्या
करे
कोई
कोसते
हैं
जले
हुए
क्या
क्या
अपने
हक़
में
दु'आ
करे
कोई
उन
से
सब
अपनी
अपनी
कहते
हैं
मेरा
मतलब
अदा
करे
कोई
चाह
से
आप
को
तो
नफ़रत
है
मुझ
को
चाहे
ख़ुदा
करे
कोई
उस
गिले
को
गिला
नहीं
कहते
गर
मज़े
का
गिला
करे
कोई
ये
मिली
दाद
रंज-ए-फ़ुर्क़त
की
और
दिल
का
कहा
करे
कोई
तुम
सरापा
हो
सूरत-ए-तस्वीर
तुम
से
फिर
बात
क्या
करे
कोई
कहते
हैं
हम
नहीं
ख़ुदा-ए-करीम
क्यूँँ
हमारी
ख़ता
करे
कोई
जिस
में
लाखों
बरस
की
हूरें
हों
ऐसी
जन्नत
को
क्या
करे
कोई
इस
जफ़ा
पर
तुम्हें
तमन्ना
है
कि
मिरी
इल्तिजा
करे
कोई
मुँह
लगाते
ही
'दाग़'
इतराया
लुत्फ़
है
फिर
जफ़ा
करे
कोई
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जब
आँखों
में
लगाता
हूँ
तो
चुपके-चुपके
हंस-हंसकर
तेरी
तस्वीर
भी
कहती
है,
सूरत
ऐसी
होती
है
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मुयस्सर
हमें
ख़्वाब-ओ-राहत
कहाँ
ज़रा
आँख
झपकी
सहर
हो
गई
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ना-उमीदी
बढ़
गई
है
इस
क़दर
आरज़ू
की
आरज़ू
होने
लगी
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हम
तो
उस
आँख
के
हैं
देखने
वाले,
देखो
जिस
में
शोख़ी
है
बहुत
और
हया
थोड़ी
सी
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