kabhi gunaahon ki mutlaq kafan utaar ke aa | कभी गुनाहों की मुतलक़ कफ़न उतार के आ

  - Chand Akbarabadi
कभीगुनाहोंकीमुतलक़कफ़नउतारके
तूउजलीरूहसेमैलाबदनउतारके
जोमेरेवस्लकाएहसासतुझपेतारीहै
किसीकेलम्सकीसारीछुवनउतारके
नईहयातकेकपड़ेलिएहैमौतखड़ी
पुरानाज़िंदगीकापैरहनउतारके
नज़रमेंशर्महयाकाभीपासबाक़ीरहे
नज़रकीशोख़ियोंकोगुल-बदनउतारके
नईबहारनेपैग़ामयेहवाकोदिया
गुलोंकेतनसेख़िज़ाँकाकफ़नउतारके
हमेशाउड़तेहैंताइरतिरेतसव्वुरके
कभीतोज़ेहनसेफ़िक्र-ए-सुख़नउतारके
  - Chand Akbarabadi
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