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Avtar Singh Jasser
ain-mumkin hai mujhe vo chhod jaa.e
ain-mumkin hai mujhe vo chhod jaa.e | ऐन-मुमकिन है मुझे वो छोड़ जाए
- Avtar Singh Jasser
ऐन-मुमकिन
है
मुझे
वो
छोड़
जाए
ग़ैर-मुमकिन
है
मुझे
वो
भूल
पाए
- Avtar Singh Jasser
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चाहे
तो
कोशिश
कर
लो
दावा
है
भूल
न
पाओगी
जब
भी
ज़िक्र-ए-वफ़ा
होगा
तुम
मेरे
शे'र
सुनाओगी
Harsh saxena
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वो
तिरे
नसीब
की
बारिशें
किसी
और
छत
पे
बरस
गईं
दिल-ए-बे-ख़बर
मिरी
बात
सुन
उसे
भूल
जा
उसे
भूल
जा
Amjad Islam Amjad
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हाथ
मेरे
भूल
बैठे
दस्तकें
देने
का
फ़न
बंद
मुझ
पर
जब
से
उस
के
घर
का
दरवाज़ा
हुआ
Parveen Shakir
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तिरे
सिवा
भी
कहीं
थी
पनाह
भूल
गए
निकल
के
हम
तिरी
महफ़िल
से
राह
भूल
गए
Majrooh Sultanpuri
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सब
से
पुर-अम्न
वाक़िआ
ये
है
आदमी
आदमी
को
भूल
गया
Jaun Elia
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हुआ
जो
इश्क़
तो
वो
रोज़
ओ
शब
को
भूल
गए
वो
अपने
इश्क़
ए
नुमाइश
में
सब
को
भूल
गए
कहाँ
वो
दुनिया
में
आए
थे
बंदगी
के
लिए
मिला
सुकून
जहाँ
में
तो
रब
को
भूल
गए
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Hameed Sarwar Bahraichi
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सारे
ग़म
भूल
गए
आपके
रोने
पे
मुझे
किसको
ठंडक
में
पसीने
का
ख़्याल
आता
है
आखरी
उम्र
में
जाते
है
मदीने
हम
लोग
मरने
लगते
है
तो
जीने
का
ख़याल
आता
है
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Nadir Ariz
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काश
तू
सब
याद
रखती
और
मैं
सब
भूल
जाता
हाँ
मगर
ऐसा
न
होना
भी
तो
क़िस्मत
थी
हमारी
shaan manral
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यहाँँ
अनजान
हो
तुम
भी
यहाँँ
अनजान
हैं
हम
भी
किसी
की
जान
हो
तुम
भी
किसी
की
जान
हैं
हम
भी
बड़े
नादान
हो
तुम
भी
बड़े
नादान
हैं
हम
भी
अतः
वीरान
हो
तुम
भी
अतः
वीरान
हैं
हम
भी
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Vivek Vistar
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कुछ
इस
तरह
से
याद
आते
रहे
हो
कि
अब
भूल
जाने
को
जी
चाहता
है
Akhtar Shirani
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इस
ज़माने
में
नहीं
अगले
ज़माने
में
सही
मैं
तुझे
अपना
बनाऊँगा
मेरा
वा'दा
रहा
Avtar Singh Jasser
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फिर
दिसंबर
की
फ़ज़ा
हो
शाम
हो
हाथ
हाथों
में
तेरा
हो
शाम
हो
हों
मेरी
क़िस्मत
में
ऐसे
लम्हे
भी
मुझ
सेे
तू
लिपटा
हुआ
हो
शाम
हो
ऐ
ख़ुदा
मुझको
वो
लम्हे
से
बचा
अलविदा
उसने
कहा
हो
शाम
हो
याद
में
तुम
हाथ
में
जाम
ओ
क़दाह
बह
रही
ठंडी
हवा
हो
शाम
हो
क़ाफ़िला
'जस्सर'
तुम्हारी
याद
का
सहन
ए
दिल
में
आ
रुका
हो
शाम
हो
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Avtar Singh Jasser
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मुझे
उस
पे
तअज्जुब
हो
रहा
है
जुदा
हो
कर
वो
मुझ
सेे
रो
रहा
है
किसी
का
रफ़्ता-रफ़्ता
हो
रहा
है
मुझे
वो
रफ़्ता-रफ़्ता
खो
रहा
है
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Avtar Singh Jasser
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कोई
पुरसोज़
सी
बज़्म-ए-सुख़न
इरशाद
होने
दो
ग़म-ए-फ़ुर्क़त
से
इस
दिल
को
ज़रा
आबाद
होने
दो
अभी
भी
वक़्त
है
हमदम
निकल
जाओ
मुहब्बत
से
अकेला
ही
मुझे
इस
आग
में
बर्बाद
होने
दो
तुम्हें
आज़ाद
कर
दूँगा
मुहब्बत
से
मगर
जस्सर
गिरफ़्त-ए-इश्क़
से
पहले
मुझे
आज़ाद
होने
दो
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Avtar Singh Jasser
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मैं
तो
जस्सर
और
भी
रौशन
हुआ
जब
किसी
ने
भी
बुझाया
देर
तक
Avtar Singh Jasser
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