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Abdulla Asif
haalat ko uski dekh parinde nahin ude
haalat ko uski dekh parinde nahin ude | हालत को उसकी देख परिंदे नहीं उड़े
- Abdulla Asif
हालत
को
उसकी
देख
परिंदे
नहीं
उड़े
कोना
फटा
हुआ
था
शिकारी
के
जाल
का
इल्ज़ाम
यूँँ
तो
रख
दिया
हर
ऐन-ग़ैन
पर
ख़ुद
मैं
ही
ज़िम्मेदार
था
अपने
ज़वाल
का
- Abdulla Asif
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अदावत
के
तक़ाज़ों
में
मुहब्बत
पहले
आती
है
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हालत
को
उसकी
देख
परिंदे
नहीं
उड़े
कोना
फटा
हुआ
था
शिकारी
के
जाल
का
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ब-चश्म-ए-अश्कबार
है
जबीं
ज़मीन
पर
मगर
ये
अश्क
जा
रहे
हैं
चर्ख़
की
तरफ़
Abdulla Asif
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चलो
तन्हाइयों
को
आज
फिर
आबाद
करते
हैं
किसी
भूली
हुई
हस्ती
को
दिल
से
याद
करते
हैं
बुरी
आदत
है
मुझको
भूलने
की
इसलिए
ऐ
दोस्त
जिसे
है
भूलना
अक्सर
उसी
को
याद
करते
हैं
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Abdulla Asif
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चाहते
हैं
मगर
नहीं
हँसते
लोग
जो
ख़ास-कर
नहीं
हँसते
मैं
जहाँ
हूँ
वहाँ
नहीं
होता
मुझपे
उस
दिन
अगर
नहीं
हँसते
बेमुरव्वत
हैं
किस
कदर
ये
लोग
मेरी
नाकामी
पर
नहीं
हँसते
ज़िन्दगी
फिर
गुज़ारनी
है
कल
सोचकर
रात
भर
नहीं
हँसते
उनके
मुँह
से
वफ़ा
की
बातें
सुन
ख़ुद
पे
हँसते
अगर
नहीं
हँसते
एक
लकड़ी
से
ही
बना
आरा
तब
से
सारे
शजर
नहीं
हँसते
इक
तुम्हारे
उदास
होने
से
अब
नगर
के
नगर
नहीं
हँसते
गर
पता
होता
हासिल-ए-मंज़िल
फिर
तो
हम
रस्ते
भर
नहीं
हँसते
गर्दिश-ए-वक़्त
टूट
जाता
है
आप
जब
वक़्त
पर
नहीं
हँसते
जानते
हो
तुम
उसको
वो
हाँ
बख़्त
तो
मियाँ
बख़्त
पर
नहीं
हँसते
बात
इंसान
की
तू
करता
है
पीछे
रहकर
सिफ़र
नहीं
हँसते
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