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A R Sahil "Aleeg"
shikaayat to bahut hai aur
shikaayat to bahut hai aur | शिकायत तो बहुत है और
- A R Sahil "Aleeg"
शिकायत
तो
बहुत
है
और
सितम
ये,
कर
नहीं
सकता
- A R Sahil "Aleeg"
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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ख़याल
में
भी
उसे
बे-रिदा
नहीं
किया
है
ये
ज़ुल्म
मुझ
सेे
नहीं
हो
सका
नहीं
किया
है
Ali Zaryoun
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सुतून-ए-दार
पे
रखते
चलो
सरों
के
चराग़
जहाँ
तलक
ये
सितम
की
सियाह
रात
चले
Majrooh Sultanpuri
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ज़माना
ज़ुल्म
करता
है
ख़ुशी
से
कभी
तुझ
को
कभी
मुझ
को
सताए
Meem Alif Shaz
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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जो
अंजान
थे
वो
मेरे
यार
निकले
मगर
जो
भी
अपने
थे
बेकार
निकले
ज़मीं
खा
गई
उन
वफ़ाओं
को
आख़िर
सितम
ये
हुआ
हम
गुनहगार
निकले
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Hameed Sarwar Bahraichi
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तबक़ों
में
रंग-ओ-नस्ल
के
उलझा
के
रख
दिया
ये
ज़ुल्म
आदमी
ने
किया
आदमी
के
साथ
Bakhtiyar Ziya
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ख़ून
से
सींची
है
मैं
ने
जो
ज़मीं
मर
मर
के
वो
ज़मीं
एक
सितम-गर
ने
कहा
उस
की
है
Javed Akhtar
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सितम
भी
मुझ
पे
वो
करता
रहा
करम
की
तरह
वो
मेहरबाँ
तो
न
था
मेहरबान
जैसा
था
Anwar Taban
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क्या
सितम
है
कि
अब
तिरी
सूरत
ग़ौर
करने
पे
याद
आती
है
Jaun Elia
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इश्क़
इक
बार
रूठ
जाए
जब
जान
दे
कर
भी
तो
नहीं
मनता
A R Sahil "Aleeg"
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इश्क़
के
मकतब
में
मिलती
है
फ़क़त
उनको
ही
छुट्टी
बे-वफ़ाई
और
जफ़ाई
का
हुनर
आता
हो
जिनको
A R Sahil "Aleeg"
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मुआफी
माँ
ने
माँगी
इश्क़
में
की
बे-वफ़ाई
जो
ग़ज़ाला
ने
सवाली
माँ
थी
करता
क्या
मु'आफ़ी
दे
दी
हमने
भी
ग़ज़ाला
को
A R Sahil "Aleeg"
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बुजुर्गों
की
रिवायत
अब
सँभालो
तुम
हुई
है
उम्र
'साहिल'
वक़्त-ए-रूख़्सत
है
A R Sahil "Aleeg"
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दो
ही
मज़हब
हैं
दुनिया-ए-फ़ानी
में
बस
मज़हब-ए-रूह
या
मज़हब-ए-नफ़्स
है
A R Sahil "Aleeg"
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