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A R Sahil "Aleeg"
ishq ka bojh sar pe bhari hai
ishq ka bojh sar pe bhari hai | इश्क़ का बोझ सर पे भारी है
- A R Sahil "Aleeg"
इश्क़
का
बोझ
सर
पे
भारी
है
फिर
भी
साँसों
का
रक़्स
जारी
है
छील
देता
है
भरते
ज़ख़्मों
को
ग़म
की
भी
ख़ूब
दस्तकारी
है
तेरी
आँखों
के
इन
चराग़ों
में
रौशनी
आज
भी
हमारी
है
जाने
किस
किस
पे
मेहरबाँ
है
वो
जाने
किस
किस
की
दावेदारी
है
दोस्त-ओ-दुश्मन
में
फ़र्क
है
ग़ाइब
अब
जिसे
देखिए
शिकारी
है
इक
इशारे
पे
नाचते
हैं
सब
तू
ख़ुदा
है
कि
फिर
मदारी
है
मौत
से
सब
का
सामना
होगा
इक
न
इक
दिन
सभी
की
बारी
है
क्या
कहें
ज़िंदगी
के
बारे
में
यूँँ
समझ
लो
कि
बस
गुज़ारी
है
है
जो
'साहिल'
ग़ज़ल
की
सूरत
ये
इश्क़
का
मुझ
पे
देनदारी
है
- A R Sahil "Aleeg"
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इश्क़
में
मरता
कभी
कोई
नहीं
है
मौत
होती
है
फ़क़त
वादे
वफ़ा
की
A R Sahil "Aleeg"
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न
कोई
शिकवा
शिकायत,
न
रोना-धोना,
न
कोशिश
करूँँगा
मैं
रोकने
की
फ़क़त
इतना
कह
दो,
इस
बेवफ़ाई
की
क्या
वजह
है?
ख़ता
आख़िर
क्या
है
मेरी
A R Sahil "Aleeg"
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न
तो
अल्फ़ाज़
होते
हैं
न
ही
तहरीर
होती
है
बयाँ
इस
इश्क़
में
क्या
क्या
निगाहों
से
नहीं
होता
A R Sahil "Aleeg"
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उनको
रुमी
भला
कैसे
भूल
पाएँगे
बतलाओ
देख
जिसको
यहाँ
मेरा
दिल
ये
भूला
धड़कना
भी
A R Sahil "Aleeg"
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है
साहिल
नाम,
बस
इतना
ही
काफ़ी
है
रखो
तुम
याद,
चाहो
तो
भुला
देना
A R Sahil "Aleeg"
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