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Arman Habib
ham apni chhat par ibaadaton men jo sar jhukaayein gunaah kaisa
ham apni chhat par ibaadaton men jo sar jhukaayein gunaah kaisa | हम अपनी छत पर इबादतों में जो सर झुकाएँ गुनाह कैसा
- Arman Habib
हम
अपनी
छत
पर
इबादतों
में
जो
सर
झुकाएँ
गुनाह
कैसा
हम
अपने
हक़
के
लिए
लड़ेंगे
तिरी
ये
जुरअत
नहीं
चलेगी
- Arman Habib
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शाम
होते
ही
थक
गया
सूरज
चाँद
के
क़ब्ज़े
में
जहाँ
आया
Arman Habib
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कौन
कहता
है
ये
बला
है
इश्क़
ग़म-ज़दों
के
लिए
शिफ़ा
है
इश्क़
मैं
सुना
हूँ
हकीम
को
कहते
क़ल्ब
की
कार-गर
दवा
है
इश्क़
देख
कर
मह-जबीं
को
समझा
मैं
दिल
के
धड़कन
की
इक
सदा
है
इश्क़
कह
रहा
था
हराम
आलिम
इक
जबकि
इक
नेक
ये
अदा
है
इश्क़
इश्क़
का
जिसने
ज़ाइक़ा
चक्खा
फिर
न
बोला
कि
ये
बुरा
है
इश्क़
गर
नहीं
मिल
सका
ख़ुदा-हाफ़िज़
मिल
गया
गर
जो
फिर
ख़ुदा
है
इश्क़
जिस
ख़ता
पे
मैं
रक़्स
करता
हूँ
ज़िंदगी
की
वही
ख़ता
है
इश्क़
इश्क़
कर
मर
गए
सभी
लेकिन
पर
अभी
तक
नहीं
मरा
है
इश्क़
जिस
में
मर
कर
भी
लोग
जीते
हैं
ख़ूब-सूरत
वो
हादसा
है
इश्क़
तू
क़यामत
तलक
रहे
ज़िंदा
मेरा
तुझको
यही
दु'आ
है
इश्क़
हैं
ये
अरमान
सूफ़िया
कहते
रूह
की
पाक
इक
ग़िज़ा
है
इश्क़
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Arman Habib
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जाने
के
बाद
आप
के
हम
ने
अपने
दिल
को
राख
सा
पाया
Arman Habib
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बाद
मुद्दत
के
मेरे
बातों
में
आज
फिर
उसका
हाँ
में
हाँ
आया
Arman Habib
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मस्जिद
के
पास
जबकि
मकाँ
उसका
है
मगर
मैं
हूँ
कि
अब
तलक
भी
नमाज़ी
न
बन
सका
Arman Habib
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