दरख़्तों के साए भी झुलसा रहे हैं

  - arjun chamoli
दरख़्तोंकेसाएभीझुलसारहेहैं
यहीइश्क़हैहमकिएजारहेहैं
कभी
समाँपेभीबिजलीगिरेअब
ज़मींपेसितमक्यूँँसभीढारहेहैं
तलाश-ए-सुकूँजोमोहब्बतमेंकरते
किचैन-ओ-अमनरोज़दफ़नारहेहैं
किसीहुस्नवालेनेआदतछोड़ी
रक़ीबोंकोआपसमेंउलझारहेहैं
कफ़नमेंसेमुर्दायेख़ुशहोकेबोला
जरावक़्तबीतेकिसबरहेहैं
फ़क़ीरीमिरीदेखअंधेहुएया
बुरावक़्तहैलोगक़तरारहेहैं
  - arjun chamoli
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