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Arbab Shaz
KHvaahish bahut hai ja ke lag jaaunga gale se
KHvaahish bahut hai ja ke lag jaaunga gale se | ख़्वाहिश बहुत है जा के लग जाऊँगा गले से
- Arbab Shaz
ख़्वाहिश
बहुत
है
जा
के
लग
जाऊँगा
गले
से
बरसों
से
ज़ीस्त
मुझ
को
आवाज़
दे
रही
है
- Arbab Shaz
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ख़ुशी
से
कुछ
न
मिला
अब
उदास
रहने
दो
मैं
थक
गया
हूँ
ग़मों
के
ही
पास
रहने
दो
शराब
पी
के
नशा
क्यूँँ
ख़राब
करना
है
मुझे
उन
आँखों
का
दीदार
पास
रहने
दो
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Arbab Shaz
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चलना
है
तिरे
साथ
प
दुश्वार
बहुत
है
दुनिया
तिरी
इस
दौर
की
रफ़्तार
बहुत
है
Arbab Shaz
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ज़िंदगी
ठीक
से
जिया
ही
नहीं
कब
जिऊँगा
मुझे
पता
ही
नहीं
मैं
हूँ
मेहमान
कुछ
दिनों
का
यहाँ
कोई
शिकवा
कोई
गिला
ही
नहीं
मैं
अकेला
यहाँ
तक
आया
हूँ
हम
सेफ़र
राह
में
मिला
ही
नहीं
इश्क़
में
सब
गँवा
के
भी
'अरबाब'
अपने
महबूब
से
मिला
ही
नहीं
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Arbab Shaz
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कुछ
ख़्वाहिशें
थीं
बात
थी
जो
अनकही
रही
अफ़सोस
मुख़्तसर
सी
मिरी
ज़िंदगी
रही
Arbab Shaz
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ढले
दिन
तो
सूरज
भी
ढलने
लगेगा
उजाला
नदी
में
मचलने
लगेगा
कभी
पर्वतों
की
तरह
बन
के
देखो
हवाओं
का
रुख़
भी
बदलने
लगेगा
ख़मोशी
नहीं
ये
मिरा
शोर-ए-दिल
है
जिसे
सुन
के
बुत
भी
पिघलने
लगेगा
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Arbab Shaz
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