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anupam shah
kahaanii khatm hone pe girega
kahaanii khatm hone pe girega | कहानी ख़त्म होने पे गिरेगा
- anupam shah
कहानी
ख़त्म
होने
पे
गिरेगा
ये
परदा
बीच
में
कैसे
गिरेगा
मिरे
गिरने
पे
कोई
दांव
खेलो
कहाँ
से
और
ये
कैसे
गिरेगा
यही
हम
सोचकर
डूबे
थे
उस
में
कि
दरिया
भी
समुंदर
में
गिरेगा
कि
ये
जो
वक़्त
अच्छा
जा
रहा
है
ये
बिजली
सा
कभी
हमपे
गिरेगा
फलों
की
आस
में
गुज़री
जवानी
हमें
लगता
है
अब
जैसे
गिरेगा
- anupam shah
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शाख़ों
से
टूट
जाएँ
वो
पत्ते
नहीं
हैं
हम
आँधी
से
कोई
कह
दे
कि
औक़ात
में
रहे
Rahat Indori
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तो
क्या
उसको
मैं
होंठों
से
बजाऊँ
तिरे
दर
पे
जो
घंटी
लग
गई
है
चराग़
उसने
मिरे
लौटा
दिए
हैं
अब
उसके
घर
में
बिजली
लग
गई
है
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Fahmi Badayuni
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जलते
दिए
सा
इक
बोसा
रख
कर
उस
ने
चमक
बढ़ा
दी
है
मेरी
पेशानी
की
Swapnil Tiwari
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किसी
की
बर्क़-ए-नज़र
से
न
बिजलियों
से
जले
कुछ
इस
तरह
की
हो
ता'मीर
आशियाने
की
Anwar Taban
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यूँँ
देखिए
तो
आँधी
में
बस
इक
शजर
गया
लेकिन
न
जाने
कितने
परिंदों
का
घर
गया
जैसे
ग़लत
पते
पे
चला
आए
कोई
शख़्स
सुख
ऐसे
मेरे
दर
पे
रुका
और
गुज़र
गया
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Rajesh Reddy
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बिजली
जाने
पर
भी
जो
चिल्लाता
था
तेरे
जाने
पर
वो
क्यूँ
ख़ामोश
रहा
?
Tanoj Dadhich
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जिसने
भी
इस
ख़बर
को
सुना
सर
पकड़
लिया
कल
एक
दिए
ने
आंधी
का
कॉलर
पकड़
लिया
Munawwar Rana
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लिपट
जाते
हैं
वो
बिजली
के
डर
से
इलाही
ये
घटा
दो
दिन
तो
बरसे
Dagh Dehlvi
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ये
लाल
शा
में
ये
लाल
अंबर
ये
लाल
सूरज
चमक
रहा
है
मुझे
बता
दो
कहाँ
है
खोई
तिरे
लबों
की
ये
सुर्ख़
लाली
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Anmol Mishra
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बिजली
की
तरह
लचक
रहे
हैं
लच्छे
भाई
के
है
बांधी
चमकती
राखी
Firaq Gorakhpuri
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बिछड़कर
आपसे
मैं
क्या
करूँँगा
करूँँगा
जो
भी
मैं
अच्छा
करूँँगा
मोहब्बत
दूसरी
हो
तुम
मिरी
पर
मैं
तुम
सेे
इश्क़
पहला
सा
करूँँगा
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anupam shah
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कुछ
तिश्नगी
भी
ऐसे
मिटती
नहीं
हमारी
हक़
में
नहीं
समुंदर
के
प्यास
को
बुझाना
anupam shah
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लफ़्ज़
फिर
ख़त
में
वो
बिन
लिखा
रह
गया
दिल
लिखा
हर
जगह
दिलरुबा
रह
गया
anupam shah
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मैं
अरसे
बाद
इतनी
कशमकश
से
फिर
से
गुज़रा
हूँ
कि
तेरी
इंतिज़ारी
है
औ'
तन्हा
भी
बहुत
ख़ुश
हूँ
anupam shah
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आज
की
शाम
ज़रा
रात
तक
ठहर
जाए
काश
ऐसा
भी
हो
ये
चांँद
भी
न
घर
जाए
anupam shah
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