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Daqiiq Jabaali
dard hai gham hai udaasi bhi hai tanhaaii bhi
dard hai gham hai udaasi bhi hai tanhaaii bhi | दर्द है ग़म है उदासी भी है तन्हाई भी
- Daqiiq Jabaali
दर्द
है
ग़म
है
उदासी
भी
है
तन्हाई
भी
तुम!
भी
होते
यहाँ
तो
और
भी
अच्छा
होता
- Daqiiq Jabaali
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दिल
हिज्र
के
दर्द
से
बोझल
है
अब
आन
मिलो
तो
बेहतर
हो
इस
बात
से
हम
को
क्या
मतलब
ये
कैसे
हो
ये
क्यूँँकर
हो
Ibn E Insha
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और
भी
दुख
हैं
ज़माने
में
मोहब्बत
के
सिवा
राहतें
और
भी
हैं
वस्ल
की
राहत
के
सिवा
Faiz Ahmad Faiz
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इश्क़
से
तबीअत
ने
ज़ीस्त
का
मज़ा
पाया
दर्द
की
दवा
पाई
दर्द-ए-बे-दवा
पाया
Mirza Ghalib
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ज़ख़्म
दिल
के
भरे
नहीं
अब
तक
और
इक
दर्द
फिर
हरा
कर
लूँ
अब
भरोसा
नहीं
किसी
का
पर
तू
कहे
तो
यक़ीं
तिरा
कर
लूँ
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Harsh saxena
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ख़ुदा
ने
फ़न
दिया
हमको
कि
लड़के
इश्क़
लिखेंगे
ख़ुदा
कब
जानता
था
हम,
ग़ज़ल
में
दर्द
भर
देंगे
Prashant Sharma Daraz
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रात
भर
दर्द
की
शम्अ
जलती
रही
ग़म
की
लौ
थरथराती
रही
रात
भर
Makhdoom Mohiuddin
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सारे
दुख
सो
जाएँगे
लेकिन
इक
ऐसा
ग़म
भी
है
जो
मिरे
बिस्तर
पे
सदियों
का
सफ़र
रख
जाएगा
Azm Shakri
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दर्द
ऐसा
नजरअंदाज
नहीं
कर
सकते
जब्त
ऐसा
की
हम
आवाज
नहीं
कर
सकते
बात
तो
तब
थी
कि
तू
छोड़
के
जाता
ही
नहीं
अब
तेरे
मिलने
पे
हम
नाज
नहीं
कर
सकते
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Ismail Raaz
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ये
मयख़ाने
में
बैठ
अफ़सोस
अब
क्यूँ
तेरे
हिस्से
भी
तो
जवानी
लिखी
थी
Amaan Pathan
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तेरी
आँखों
में
जो
इक
क़तरा
छुपा
है,
मैं
हूँ
जिसने
छुप
छुप
के
तेरा
दर्द
सहा
है,
मैं
हूँ
एक
पत्थर
कि
जिसे
आँच
न
आई,
तू
है
एक
आईना
कि
जो
टूट
चुका
है,
मैं
हूँ
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Fauziya Rabab
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जब
कभी
ग़म
ने
सताया
देर
तक
मैंने
फिर
ग़ज़लों
को
गाया
देर
तक
यार
से
अपने
मैं
जब
जब
भी
मिला
सीने
से
उस
को
लगाया
देर
तक
हार
कर
भी
जब
मैं
यारों
हँस
पड़ा
दुश्मनों
ने
ग़म
मनाया
देर
तक
खौफ़
से
दुनिया
के
मैं
जब
भी
डरा
हौसला
माँ
ने
बढ़ाया
देर
तक
झूठ
कितना
भी
कहा
उसने
मगर
सच
तो
लेकिन
छुप
न
पाया
देर
तक
हाथ
ख़ुशियों
ने
कभी
पकड़ा
नहीं
साथ
तो
ग़म
ने
निभाया
देर
तक
माफ़
तुझको
मैं
भला
कैसे
करुँ
तूँ
ने
भी
तो
दिल
दुखाया
देर
तक
शा'इरी
ने
जिस
किसी
को
भी
चुना
नौकरी
वो
कर
न
पाया
देर
तक
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Daqiiq Jabaali
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दिया
दिलासा
हमने
अपने
दिल
को
बोलकर
ये
बात
हुआ
जो
कुछ
हमारे
साथ
में,
वो
इक
मज़ाक
था
Daqiiq Jabaali
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ज़्यादास
ज़्यादा
क्या
हो
जाना
है
सबने
इक
दिन
फ़ना
हो
जाना
है
ग़लती
तो
माननी
है
नइँ
ख़ुद
की
तुम
ने
तो
बस
ख़फ़ा
हो
जाना
है
दोस्त
उसको
न
चाहो
इतना
भी
उसको
तुम
सेे
जुदा
हो
जाना
है
बात
जो
कह
न
पाया
मैं
तुम
सेे
शा'इरी
में
बयाँ
हो
जाना
है
दिल
दुखा
कर
किसी
का
मेरा
भी
कौन-सा
फिर
भला
हो
जाना
है
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Daqiiq Jabaali
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देर
तक
फिर
मैं
सुकूँ
की
नींद
सोता
काश
तुमने
हाथ
मेरा
थामा
होता
मैं
तुझे
फिर
अपनी
ग़ज़लों
में
पिरोता
काश
तुझको
बस
अमित
से
इश्क़
होता
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Daqiiq Jabaali
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ग़ौर
से
सुन
यारा
मेरी
बातों
को
नींद
ही
आती
नहीं
है
रातों
को
तू
तो
बस
बकवास
करता
रहता
है
क्यूँँ
सुनूँ
मैं
यार
तेरी
बातों
को
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Daqiiq Jabaali
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