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Daqiiq Jabaali
badaa hai dil meraa maaloom hai mujhko
badaa hai dil meraa maaloom hai mujhko | बड़ा है दिल मेरा मालूम है मुझको
- Daqiiq Jabaali
बड़ा
है
दिल
मेरा
मालूम
है
मुझको
सभी
को
दिल
में
अपने
रख
नहीं
सकता
- Daqiiq Jabaali
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तिरंगा
दिल
में
है
लबों
पे
हिंदुस्तान
रखता
हूँ
सिपाही
हूँ
हथेली
पे
मैं
अपनी
जान
रखता
हूँ
Shashank Shekhar Pathak
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जैसे
तू
हुक्म
करे
दिल
मिरा
वैसे
धड़के
ये
घड़ी
तेरे
इशारों
से
मिला
रक्खी
है
Anwar Masood
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कहानी
भी
नहीं
है
दिल
में
कोई
सो
कुछ
भी
इन
दिनों
अच्छा
नहीं
है
मैं
अब
उकता
गया
हूँ
ज़िन्दगी
से
मेरा
जी
अब
कहीं
लगता
नहीं
है
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Ritesh Rajwada
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न
तेरे
आने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
न
दिल
लगाने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
क़सम
ख़ुदा
की
बताता
हूँ
राज़
ये
तुमको
नहारी
खाने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
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Paplu Lucknawi
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दोस्त
ने
दिल
को
तोड़
के
नक़्श-ए-वफ़ा
मिटा
दिया
समझे
थे
हम
जिसे
ख़लील
काबा
उसी
ने
ढा
दिया
Arzoo Lakhnavi
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हम
लबों
से
कह
न
पाए
उन
से
हाल-ए-दिल
कभी
और
वो
समझे
नहीं
ये
ख़ामुशी
क्या
चीज़
है
Nida Fazli
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किस
तरह
'अमानत'
न
रहूँ
ग़म
से
मैं
दिल-गीर
आँखों
में
फिरा
करती
है
उस्ताद
की
सूरत
Amanat Lakhnavi
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रात
यूँँ
दिल
में
तिरी
खोई
हुई
याद
आई
जैसे
वीराने
में
चुपके
से
बहार
आ
जाए
Faiz Ahmad Faiz
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अगर
हमारे
ही
दिल
में
ठिकाना
चाहिए
था
तो
फिर
तुझे
ज़रा
पहले
बताना
चाहिए
था
Shakeel Jamali
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काम
अब
कोई
न
आएगा
बस
इक
दिल
के
सिवा
रास्ते
बंद
हैं
सब
कूचा-ए-क़ातिल
के
सिवा
Ali Sardar Jafri
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कौन
सा
ग़म
नहीं
दिया
फिर
भी
ज़िन्दगी
तेरा
शुक्रिया
फिर
भी
Daqiiq Jabaali
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मैं
बोलता
हूँ
कुछ
भी
तो
अक्सर
बिगड़
जाती
है
बात
ख़ामोश
रहना
ही
मुनासिब
है
मेरी
ख़ातिर
ऐ
दोस्त
Daqiiq Jabaali
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ये
शफ़क़
शाम
ढल
रही
होगी
और
वो
छत
पर
टहल
रही
होगी
लग
गई
होगी
चोट
पैरों
में
रेत
पर
फिर
उछल
रही
होगी
आज
फिर
घूरा
होगा
लड़कों
ने
सायकिल
में
टहल
रही
होगी
कर
रही
होगी
याद
फिर
मुझको
शम'अ
बनकर
वो
जल
रही
होगी
सब
लफ़ंगे
उसे
ही
छेड़ेंगे
जब
गली
से
निकल
रही
होगी
ग़लती
करके
छिपा
रही
होगी
तिफ़्ल
जैसे
मचल
रही
होगी
नींद
आती
न
होगी
रातों
को
करवटें
ही
बदल
रही
होगी
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Daqiiq Jabaali
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जब
कभी
ग़म
ने
सताया
देर
तक
मैंने
फिर
ग़ज़लों
को
गाया
देर
तक
यार
से
अपने
मैं
जब
जब
भी
मिला
सीने
से
उस
को
लगाया
देर
तक
हार
कर
भी
जब
मैं
यारों
हँस
पड़ा
दुश्मनों
ने
ग़म
मनाया
देर
तक
ख़ौफ़
से
दुनिया
के
मैं
जब
भी
डरा
हौसला
माँ
ने
बढ़ाया
देर
तक
झूठ
कितना
भी
कहा
उसने
मगर
सच
तो
लेकिन
छुप
न
पाया
देर
तक
हाथ
ख़ुशियों
ने
कभी
पकड़ा
नहीं
साथ
तो
ग़म
ने
निभाया
देर
तक
माफ़
तुझको
मैं
भला
कैसे
करुँ
तूँ
ने
भी
तो
दिल
दुखाया
देर
तक
शा'इरी
ने
जिस
किसी
को
भी
चुना
नौकरी
वो
कर
न
पाया
देर
तक
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Daqiiq Jabaali
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हमनें
दुनिया
को
परखा
तो
ये
जाना
सबके
अंदर
इक
रावण
होता
ही
है
Daqiiq Jabaali
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