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Amit Nandan Dev
misra-e-oolaa men har baar teraa zikr kiya
misra-e-oolaa men har baar teraa zikr kiya | मिसरा-ए-ऊला में हर बार तेरा ज़िक्र किया
- Amit Nandan Dev
मिसरा-ए-ऊला
में
हर
बार
तेरा
ज़िक्र
किया
मिसरा-ए-सानी
में
बस
ख़ुद
को
अधूरा
पाया
- Amit Nandan Dev
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बिछड़
कर
लोग
अक्सर
भूल
जाते
हैं
ये
दुनिया
भी
हमें
हर
मोड़
पे
तेरा
इशारा
याद
रहता
है
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न
कोई
शिकवा
न
आँसू
न
मुस्कुराहट
है
वो
शख़्स
किस
किस
अदास
फ़रेब
करता
है
Amit Nandan Dev
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बात
वो
कर
गया
यूँँ
देख
के
कहता
क्या
था
साॅंस
लेनी
थी
मगर
नब्ज़
गिरानी
पड़ी
थी
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ग़ज़ल
में
ज़ख़्म
खिलते
थे
क़लम
था
एक
ख़ूँ
कोई
हुनर
भी
मेरे
अश्कों
का
समझता
था
जुनूँ
कोई
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आरज़ू
भी
नहीं
दु'आ
भी
नहीं
अब
तुझे
सोचने
की
जा
भी
नहीं
तेरा
अंदाज़-ए-बे-ख़बर
क्या
है
हमको
तुझ
सेे
कोई
गिला
भी
नहीं
शोख़ियों
में
है
इक
तवाज़ुन
सा
हुस्न
बेज़ार
है
दगा
भी
नहीं
मैं
जहाँ
भी
गया
वहीं
तू
था
ये
तसव्वुर
है
या
वफ़ा
भी
नहीं
'देव'
हम
ज़िन्दगी
से
हार
गए
अब
किसी
दश्त
में
सदा
भी
नहीं
राह
दिखला
के
मुस्कुराया
है
उसके
दर
पर
कोई
दु'आ
भी
नहीं
ज़ख़्म
जब
दिल
के
खोलने
आए
तेरा
इल्ज़ाम
है
सबा
भी
नहीं
अब
तो
ता'बीर
की
तमन्ना
क्या
जब
त'अल्लुक़
में
सिलसिला
भी
नहीं
'देव'
अब
तर्क-ए-हौसला
कर
दे
जिसको
पाया
है
वो
ख़ुदा
भी
नहीं
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Amit Nandan Dev
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