na pooch manzar-e-shaam-o-seher pe kya guzri | न पूछ मंज़र-ए-शाम-ओ-सहर पे क्या गुज़री

  - Ameer Qazalbash
पूछमंज़र-ए-शाम-ओ-सहरपेक्यागुज़री
निगाहजबभीहक़ीक़तसेआश्नागुज़री
हमारेवास्तेवीरानी-ए-नज़रहरसू
हमींनेदश्तसजाएहमींपेक्यागुज़री
जानेकैसीहक़ीक़तकाआइनाहूँमैं
नज़रनज़रमिरेनज़दीकसेख़फ़ागुज़री
येज़र्दहोगएकैसेहरेभरेअश्जार
जोलोगसाएमेंबैठेथेउनपेक्यागुज़री
ग़ुरूबहोतीरहींउसकीनेकियाँदिनमें
हरएकरातगुनाहोंकीबे-सज़ागुज़री
जलारहाथासर-ए-शाममिशअलेंकोई
तमामरातउलझतीहुईहवागुज़री
देखपाओगेबे-मंज़रीउजालोंकी
येरातढलनेलगीतोकोईसदागुज़री
  - Ameer Qazalbash
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