kehne ko sham-e-bazm-e-zamaan-o-makaan hooñ main | कहने को शम-ए-बज़्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ हूँ मैं

  - Ameeq Hanafi
कहनेकोशम-ए-बज़्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँहूँमैं
सोचोतोसिर्फ़कुश्ता-ए-दौर-ए-जहाँहूँमैं
आताहूँमैंज़मानेकीआँखोंमेंरातदिन
लेकिनख़ुदअपनीनज़रोंसेअबतकनिहाँहूँमैं
जातानहींकिनारोंसेआगेकिसीकाध्यान
कबसेपुकारताहूँयहाँहूँयहाँहूँमैं
इकडूबतेवजूदकीमैंहीपुकारहूँ
औरआपहीवजूदकाअंधाकुआँहूँमैं
सिगरेटजिसेसुलगताहुआकोईछोड़दे
उसकाधुआँहूँऔरपरेशाँधुआँहूँमैं
  - Ameeq Hanafi
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