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Aman Mishra 'Anant'
socho kitna achha ho saka hai
socho kitna achha ho saka hai | सोचो कितना अच्छा हो सकता है
- Aman Mishra 'Anant'
सोचो
कितना
अच्छा
हो
सकता
है
ये
सब
पहले
जैसा
हो
सकता
है
बुरखे
वाली
वो
चंदन
वाला
मैं
साहब
क्या
ये
रिश्ता
हो
सकता
है
- Aman Mishra 'Anant'
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मेरे
दर्द
की
वो
दवा
है
मगर
मेरा
उस
सेे
कोई
भी
रिश्ता
नहीं
मुसलसल
मिलाता
है
मुझ
सेे
नज़र
मैं
कैसे
कहूँ
वो
फ़रिश्ता
नहीं
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S M Afzal Imam
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दुश्मनी
लाख
सही
ख़त्म
न
कीजे
रिश्ता
दिल
मिले
या
न
मिले
हाथ
मिलाते
रहिए
Nida Fazli
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उस
लड़की
से
बस
अब
इतना
रिश्ता
है
मिल
जाए
तो
बात
वगैरा
करती
है
बारिश
मेरे
रब
की
ऐसी
नेमत
है
रोने
में
आसानी
पैदा
करती
है
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Tehzeeb Hafi
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इस
दौर-ए-सियासत
का
इतना
सा
फ़साना
है
बस्ती
भी
जलानी
है
मातम
भी
मनाना
है
Unknown
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इतना
मसरूफ़
हूँ
जीने
की
हवस
में
'शाहिद'
साँस
लेने
की
भी
फ़ुर्सत
नहीं
होती
मुझ
को
Shahid Zaki
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काँटों
से
दिल
लगाओ
जो
ता-उम्र
साथ
दें
फूलों
का
क्या
जो
साँस
की
गर्मी
न
सह
सकें
Akhtar Shirani
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इक
दिए
से
बँध
गई
है
मेरी
साँस
की
रिदम,
इक
लकीर
पर
टिकी
है
मेरी
ज़िंदगी
की
डोर
Aves Sayyad
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जीत
भी
लूँ
गर
लड़ाई
तुम
से
मैं
तो
क्या
मिलेगा
हाथ
में
दोनों
के
बस
इक
टूटा
सा
रिश्ता
मिलेगा
कर
के
लाखों
कोशिशें
गर
जो
बचा
भी
लूँ
मैं
रिश्ता
तो
नहीं
फिर
मन
हमारा
पहले
के
जैसा
मिलेगा
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Ankit Maurya
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निभाया
जिस
सेे
भी
रिश्ता
तो
फिर
हद
में
रहे
हैं
हम
किसी
के
मखमली
तकिए
के
ऊपर
सर
नहीं
रक्खा
Nirbhay Nishchhal
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हमारे
साँस
भी
ले
कर
न
बच
सके
अफ़ज़ल
ये
ख़ाक-दान
में
दम
तोड़ते
हुए
सिगरेट
Afzal Khan
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अब
तू
इन
आँखों
का
ख़्वाब
नहीं
हो
सकता
इस
सेे
ज़्यादा
और
ख़राब
नहीं
हो
सकता
हर
इक
लड़की
उस
सी
देवी
नइ
हो
सकती
अब
हर
इक
फूल
गुलाब
नहीं
हो
सकता
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Aman Mishra 'Anant'
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मर्द
हो
तो
शान
से
मर्दानगी
का
मान
रखना
औरतों
के
उन
दिनों
में
औरतों
का
ध्यान
रखना
मुझको
ग़ालिब
मीर
तो
समझे
नहीं
उसने
कहा
था
तुम
अगर
शायर
बनो
तो
शे'र
को
आसान
रखना
लाख
घर
देखे
मगर
हमको
तो
भाई
ये
सहूलत
बंद
रौशनदान
रखना
कमरे
को
वीरान
रखना
हम
से
जो
वादे
हुए
वो
टूटते
हैं
हर
घड़ी
पर
हर
वचन
का
मान
रखना
हाथ
में
जब
पान
रखना
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Aman Mishra 'Anant'
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मैंने
उसके
बालों
पर
कविता
की
उसने
मेरे
गालों
पर
कविता
की
किसने
दुख
समझा
है
हम
जैसों
का
किसने
टूटे
हालों
पर
कविता
की
सबने
गुण
गाए
है
तलवारों
के
किसने
बोलो
ढालों
पर
कविता
की
उसने
ही
फेंका
है
पुल
से
कचरा
जिसने
गंदे
नालों
पर
कविता
की
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Aman Mishra 'Anant'
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शिकायत
क्या
ही
करते
ज़िंदगी
से
हमें
धोका
मिला
था
इक
परी
से
नज़र
के
पास
होते
हैं
किसी
के
नज़र-अंदाज़
होते
हैं
किसी
से
अकेले
पन,
अँधेरों
के
सँभाले
सिहरस
जाते
हैं
हम
रौशनी
से
ये
क्या
है,
पूरे
दिन
मायूस
रह
कर
सभी
कुछ
भूल
जाना
इक
हँसी
से
है
इतना
ग़म
भरा
अंदर
हमारे
कि
रोने
लगते
हैं
हम
गुदगुदी
से
वो
जिनके
दर्द
में
लिखता
हूँ
मैं
वो
मज़ा
लेते
हैं
मेरी
शा'इरी
से
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Aman Mishra 'Anant'
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जब
उसके
ठुकराए
आते
हैं
दुनिया
से
उकताए
आते
हैं
पहले
तुम
आती
थी
सपनों
में
अब
सपनों
में
साए
आते
हैं
समझा
लेता
हूँ
सबको
पर
जब
मज़हब
के
बहकाए
आते
हैं
है
वो
ज़ालिम
पत्थर
दिल
तो
फिर
हम
भी
सर
टकराए
आते
हैं
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Aman Mishra 'Anant'
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