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Almas Rizvi
dil men vehshat hai ek uljhan hai
dil men vehshat hai ek uljhan hai | दिल में वहशत है एक उलझन है
- Almas Rizvi
दिल
में
वहशत
है
एक
उलझन
है
आख़िरी
रात
तो
नहीं
है
मेरी
- Almas Rizvi
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ये
ज़मीं
किस
क़दर
सजाई
गई
ज़िंदगी
की
तड़प
बढ़ाई
गई
आईने
से
बिगड़
के
बैठ
गए
जिन
की
सूरत
जिन्हें
दिखाई
गई
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Sahir Ludhianvi
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कोई
दीवाना
कहता
है
कोई
पागल
समझता
है
मगर
धरती
की
बेचैनी
को
बस
बादल
समझता
है
Kumar Vishwas
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तड़पना
हिज्र
तक
सीमित
नहीं
है
उसे
दुल्हन
भी
बनते
देखना
है
Anand Verma
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उसको
नंबर
देके
मेरी
और
उलझन
बढ़
गई
फोन
की
घंटी
बजी
और
दिल
की
धड़कन
बढ़
गई
Ana Qasmi
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कोई
मेरे
दिल
से
पूछे
तिरे
तीर-ए-नीम-कश
को
ये
ख़लिश
कहाँ
से
होती
जो
जिगर
के
पार
होता
Mirza Ghalib
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अब
शहर
की
थकावट
बेचैन
कर
रही
है
अब
शाम
हो
गई
है
चल
माँ
से
बात
कर
लें
Akash Rajpoot
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ऐ
दिल
की
ख़लिश
चल
यूँँही
सही
चलता
तो
हूँ
उन
की
महफ़िल
में
उस
वक़्त
मुझे
चौंका
देना
जब
रंग
पे
महफ़िल
आ
जाए
Behzad Lakhnavi
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उसे
बेचैन
कर
जाऊँगा
मैं
भी
ख़मोशी
से
गुज़र
जाऊँगा
मैं
भी
Ameer Qazalbash
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रात
बेचैन
सी
सर्दी
में
ठिठुरती
है
बहुत
दिन
भी
हर
रोज़
सुलगता
है
तिरी
यादों
से
Amit Sharma Meet
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बड़ी
जल्दी
में
था
उस
दिन
ज़रा
बेचैन
भी
था
वो
उसे
कहना
था
कुछ
मुझ
सेे
मगर
वो
कह
नहीं
पाया
Varun Anand
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दिल
ए
मरीज़
ने
दिल
से
तुझे
पुकारा
है
तू
मेरी
ज़ीस्त
का
अब
आख़िरी
सहारा
है
Almas Rizvi
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दुनिया
की
नेमतों
से
है
बेज़ार
ज़िंदगी
अब
देखती
है
जीने
के
आसार
ज़िंदगी
Almas Rizvi
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सर
उठा
सकता
नहीं
कोई
यज़ीदी
हश्र
तक
कर
दिया
कुछ
इतना
ख़म
बातिल
का
सर
अब्बास
ने
Almas Rizvi
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हमको
हसरत
ही
रही
कोई
हमारा
होता
कुछ
तो
तन्हाई
की
रातों
में
सहारा
होता
दिल
ने
देखा
ही
नहीं
और
किसी
की
जानिब
वरना
इस
दौर
में
कोई
तो
हमारा
होता
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Almas Rizvi
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आज
भी
रौशन
है
जिसके
दम
से
ये
दीन-ए-ख़ुदा
मकतब-ए-इस्लाम
में
बस
वो
दिया
ज़ैनब
का
है
Almas Rizvi
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