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Ankit Yadav
lafz inke javaabi nahin lag rahe
lafz inke javaabi nahin lag rahe | लफ्ज़ इनके जवाबी नहीं लग रहे
- Ankit Yadav
लफ्ज़
इनके
जवाबी
नहीं
लग
रहे
और
ये
ख़त
आख़िरी
भी
नहीं
लग
रहे
अजनबी
कौन
हो
तुम
मिरे
शहर
में
तुम
मुझे
अजनबी
ही
नहीं
लग
रहे
ये
हँसी
भी
तुम्हारी
नहीं
लग
रही
ये
लतीफ़े
किताबी
नहीं
लग
रहे
तुमको
छूने
में
डर
एक
ये
भी
तो
है
होंठ
अब
ये
गुलाबी
नहीं
लग
रहे
मैं
तुम्हें
मौत
लगने
लगा
हूँ
तो
क्या
ज़िंदगी
आज
तुम
भी
नहीं
लग
रहे
- Ankit Yadav
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दिल
की
तमन्ना
थी
मस्ती
में
मंज़िल
से
भी
दूर
निकलते
अपना
भी
कोई
साथी
होता
हम
भी
बहकते
चलते
चलते
Majrooh Sultanpuri
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मुझ
में
अब
मैं
नहीं
रही
बाक़ी
मैं
ने
चाहा
है
इस
क़दर
तुम
को
Ambreen Haseeb Ambar
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ज़हीफ़ी
इस
लिए
मुझको
सुहानी
लग
रही
है
इसे
कमाने
में
पूरी
जवानी
लग
रही
है
नतीजा
ये
है
कि
बरसों
तलाश-ए-ज़ात
के
बाद
वहाँ
खड़ा
हूँ
जहाँ
रेत
पानी
लग
रही
है
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Khalid Sajjad
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सफ़र
हालाँकि
तेरे
साथ
अच्छा
चल
रहा
है
बराबर
से
मगर
एक
और
रास्ता
चल
रहा
है
Shariq Kaifi
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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अभी
से
पाँव
के
छाले
न
देखो
अभी
यारो
सफ़र
की
इब्तिदा
है
Ejaz Rahmani
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'अंजुम'
तुम्हारा
शहर
जिधर
है
उसी
तरफ़
इक
रेल
जा
रही
थी
कि
तुम
याद
आ
गए
Anjum Rehbar
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मुक़र्रर
दिन
नहीं
तो
लम्हा-ए-इमकान
में
आओ
अगर
तुम
मिल
नहीं
सकती
तो
मेरे
ध्यान
में
आओ
बला
की
ख़ूब-सूरत
लग
रही
हो
आज
तो
जानाँ
मुझे
इक
बात
कहनी
थी
तुम्हारे
कान
में..
आओ
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Darpan
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वो
अजब
शख़्स
था
हर
हाल
में
ख़ुश
रहता
था
उस
ने
ता-उम्र
किया
हँस
के
सफ़र
बारिश
में
Sahiba sheharyaar
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल
तो
जुस्तुजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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ऐ
बदन
ख़्वाहिश–ए–सादा
क्या
है
दर्द
है
इश्क़
है
ज़्यादा
क्या
है
एक
लड़की
है
किताबें
दो
हैं
सोच
फिर
मेरा
इरादा
क्या
है
है
भरोसे
का
त'आक़ुब
तुमको
मैं
तो
दिल
तोड़
दूँ
वा'दा
क्या
है
पूछती
है
कि
ग़रीबों
को
यहाँ
उसकी
तस्वीर
से
ज़्यादा
क्या
है
है
तुझे
जंग
ही
दर-पेश
अगर
सोच
शतरंज
में
प्यादा
क्या
है
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Ankit Yadav
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बुला
के
मुझको
कहीं
एक
दिन
अकेले
में
वो
पूछती
है
हसीनों
के
ख़्वाब
क्यूँँ
तोड़े
महक
रहा
है
गुलाबों
से
आज
उसका
बदन
फिर
उसके
बाग़
से
कोई
गुलाब
क्यूँँ
तोड़े
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Ankit Yadav
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इक
उम्र
गुज़ारी
है
मैंने
उन
आँखों
के
तह-ख़ानों
में
उन
आँखों
के
आगे
शायद
झीलें
होंगी
दरिया
होगा
Ankit Yadav
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यूँँ
इशारे
में
कुछ
कहा
है
क्या
मेरे
बारे
में
कुछ
नया
है
क्या
अब
तो
कुछ
भी
समझ
नहीं
आता
दिल
किसी
बोझ
से
दबा
है
क्या
रास्तों
में
बड़ी
उदासी
है
हादसा
फिर
से
हो
गया
है
क्या
अब
दरीचे
पे
तुम
नहीं
आती
अब
तुम्हें
देखना
मना
है
क्या
दूर
जाने
की
बात
करते
हो
सच
कहो
मन
बना
लिया
है
क्या
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Ankit Yadav
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उसे
छोड़ो
हमारे
हाथ
का
बिगड़ा
हुआ
है
वो
हमारे
हाथ
के
बिगड़े
हुए
बर्तन
नहीं
बनते
Ankit Yadav
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