hijr ki shaam se zaKHmon ke doshaale maanguun | हिज्र की शाम से ज़ख़्मों के दोशाले माँगूँ

  - Akmal Imaam
हिज्रकीशामसेज़ख़्मोंकेदोशालेमाँगूँ
मैंसियाहीकेसमुंदरसेउजालेमाँगूँ
जबनईनस्लनईतर्ज़सेजीनाचाहे
क्यूँँउसअहदसेदस्तूरनिरालेमाँगूँ
अपनेएहसासकेसहरामेंतक़द्दुसचाहूँ
अपनेजज़्बातकीघाटीमेंशिवालेमाँगूँ
अपनीआँखोंकेलिएदर्दकेआँसूढूँडूँ
अपनेक़दमोंकेलिएफूलसेछालेमाँगूँ
हरनएमोड़पेचाहूँनएरिश्तोंकाहुजूम
हरक़दमपरमैंनएचाहनेवालेमाँगूँ
अपनेएहसासकीशिद्दतकोबुझानेकेलिए
मैंनईतर्ज़केख़ुश-फ़िक्ररिसालेमांगों
दिनकीसड़कोंपेसजाकरनईसुब्हें'अकमल'
शबकीचौखटकेलिएआहनीतालेमांगों
  - Akmal Imaam
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy