अभीरंज-ए-सफ़रकीइब्तिदाहै
अभीसेजीबहुतघबरारहाहै
दिएबुझनेलगेहैंताक़चोंमें
हरइकशयपरअँधेराछारहाहै
हवाशाख़ोंमेंछुपकररोरहीहै
नजानेकैसामौसमआरहाहै
ठिठुरतीरुतमेंज़ख़्मीउँगलियोंसे
हमेंदरियामेंसोनाढूँढ़नाहै
इसीउम्मीदपरबन-बासकाटें
हमेंभीएकदिनघरलौटनाहै
बहुतचाहूँकिमैंभीहाथउठाऊँ
मिरेहोंटोंपेलेकिनबद-दुआ'है