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Faiz Ahmad
bheed men dhadkano ki fas chuki hai zindagi faiz
bheed men dhadkano ki fas chuki hai zindagi faiz | भीड़ में धड़कनों की फस चुकी है ज़िन्दगी 'फ़ैज़'
- Faiz Ahmad
भीड़
में
धड़कनों
की
फस
चुकी
है
ज़िन्दगी
'फ़ैज़'
मेरा
दम
घुटता
है
इस
से
कहो
बाहर
आए
- Faiz Ahmad
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ज़िंदगी
क्या
किसी
मुफ़लिस
की
क़बा
है
जिस
में
हर
घड़ी
दर्द
के
पैवंद
लगे
जाते
हैं
Faiz Ahmad Faiz
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तुम
भी
साबित
हुए
कमज़ोर
मुनव्वर
राना
ज़िन्दगी
माँगी
भी
तुमने
तो
दवा
से
माँगी
Munawwar Rana
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ग़म-ए-हयात
में
यूँँ
ढह
गया
नसीब
का
घर
कि
जैसे
बाढ़
में
डूबा
हुआ
गरीब
का
घर
वबायें
आती
गईं
और
लोग
मरते
गए
हमारे
गाँव
में
था
ही
नहीं
तबीब
का
घर
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Ashraf Ali
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खेल
ही
तो
है
जहाँ
मैं
उसका
हूँ
ज़िन्दगी
ये
ट्वीट
बदलेगी
कभी
Neeraj Neer
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किया
बादलों
में
सफ़र
ज़िंदगी
भर
ज़मीं
पर
बनाया
न
घर
ज़िंदगी
भर
सभी
ज़िंदगी
के
मज़े
लूटते
हैं
न
आया
हमें
ये
हुनर
ज़िंदगी
भर
मोहब्बत
रही
चार
दिन
ज़िंदगी
में
रहा
चार
दिन
का
असर
ज़िंदगी
भर
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Anwar Shaoor
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शौक़,लत,आवारगी,अय्याशी
में
गुज़री
हमारी
ज़िन्दगी
अब
तू
मुनासिब
सी
सज़ा
दे
गिनती
करके
Kartik tripathi
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अब
ज़िन्दगी
से
कोई
मिरा
वास्ता
नहीं
पर
ख़ुद-कुशी
भी
कोई
सही
रास्ता
नहीं
Rahul
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जब
से
हुआ
है
कंधे
से
बस्ते
का
बोझ
कम
बढ़ते
ही
जा
रहे
हैं
मेरी
ज़िंदगी
में
ग़म
Ankit Maurya
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ज़िंदगी
और
चल
नहीं
सकती
आने
पे
मौत
टल
नहीं
सकती
Afzal Sultanpuri
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दुख
की
दीमक
अगर
नहीं
लगती
ज़िन्दगी
किस
क़द्र
हसीं
लगती
वस्ल
को
लॉटरी
समझता
हूँ
लॉटरी
रोज़
तो
नहीं
लगती
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Azbar Safeer
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कीं
कोशिशें
हज़ार
उसे
भूल
जाऊँ
मैं
वो
भी
मय-ए-कुहन
है
उतरती
नहीं
मगर
एक
उम्र
काट
दी
उसी
के
इंतिज़ार
में
कमबख़्त
शाम-ए-हिज्र
गुज़रती
नहीं
मगर
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Faiz Ahmad
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आपकी
आँखों
की
जो
कर
ले
ज़ियारत
इक
बार
उसका
दिल
फिर
तो
कहीं
और
न
माथा
टेके
Faiz Ahmad
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जश्न-ए-मक़तल
को
मिरे
शाम
मनाते
तो
सही
तुम
चराग़ों
को
हवाओं
में
जलाते
तो
सही
पा-ब-जौलाँ
ही
सही
दौड़
के
आता
मैं
तो
अपने
जानिब
मुझे
इक
बार
बुलाते
तो
सही
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Faiz Ahmad
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ये
मेरा
वहम
है
तू
याद
करती
होगी
मुझे
ये
मेरा
दावा
है
ये
वहम
भी
ग़लत
है
मिरा
Faiz Ahmad
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ये
सच
है
उस
सेे
मिलने
की
तवक्को
फिर
नहीं
करते
मगर
पहली
मोहब्बत
को
भुलाया
भी
नहीं
जाता
Faiz Ahmad
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