kis shay pe yahaañ vaqt ka saaya nahin hota | किस शय पे यहाँ वक़्त का साया नहीं होता

  - Ahmad Mushtaq
किसशयपेयहाँवक़्तकासायानहींहोता
इकख़्वाब-ए-मोहब्बतहैकिबूढ़ानहींहोता
वोवक़्तभीआताहैजबआँखोंमेंहमारी
फिरतीहैंवोशक्लेंजिन्हेंदेखानहींहोता
बारिशवोबरसतीहैकिभरजातेहैंजल-थल
देखोतोकहींअब्रकाटुकड़ानहींहोता
घिरजाताहैदिलदर्दकीहरबंदगलीमें
चाहोकिनिकलजाएँतोरस्तानहींहोता
यादोंपेभीजमजातीहैजबगर्द-ए-ज़माना
मिलताहैवोपैग़ामकिपहुँचानहींहोता
तन्हाईमेंकरनीतोहैइकबातकिसीसे
लेकिनवोकिसीवक़्तअकेलानहींहोता
क्याउससेगिलाकीजिएबर्बादी-ए-दिलका
हमसेभीतोइज़्हार-ए-तमन्नानहींहोता
  - Ahmad Mushtaq
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy