muztarib hain vaqt ke zarraat suraj se kaho | मुज़्तरिब हैं वक़्त के ज़र्रात सूरज से कहो

  - Ahmad Hamdani
मुज़्तरिबहैंवक़्तकेज़र्रातसूरजसेकहो
गईक्यूँँआगकीबरसातसूरजसेकहो
हमहैंऔरशो'लोंकीलपटेंबढ़रहीहैंहरतरफ़
क्याहुईवोछाँवकीइकबातसूरजसेकहो
नाचतेहैंयेभयानकसाएआख़िरकिसलिए
ज़ेर-ए-लबक्याकहरहीहैरातसूरजसेकहो
एकतपतादश्तहैऔरसाथकोईभीनहीं
किससफ़रमेंहैअकेलीज़ातसूरजसेकहो
रेंगतेहैंनागअंदेशोंकेसाँसोंमेंयहाँ
ढलनेमेंआतीनहींहैरातसूरजसेकहो
ज़ो'महोनेकारहाइकउम्रहमकोऔरआज
जलगएसबधूपमेंजज़्बातसूरजसेकहो
  - Ahmad Hamdani
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