kya shab thii ki dil khol ke ro bhi na sake ham | क्या शब थी कि दिल खोल के रो भी न सके हम

  - Ahmad Azeem
क्याशबथीकिदिलखोलकेरोभीसकेहम
जागेभीनहींठीकसेसोभीसकेहम
इसख़ाकसेक्याहमकोगिलादर-बदरीका
जिसख़ाककेजीजानसेहोभीसकेहम
क्याकिश्त-ए-शब-ए-हिज्रहरीहोकियहाँतो
इकबूँदलहू-रंगकीबोभीसकेहम
गर्द-ए-ग़म-ए-अय्यामसेआलूदाथींआँखें
दीद-ए-गुल-ए-रुख़्सारसेधोभीसकेहम
  - Ahmad Azeem
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