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Afkar Alvi
apne bhi tujh ko apnon men ab gin nahin rahe
apne bhi tujh ko apnon men ab gin nahin rahe | अपने भी तुझ को अपनों में अब गिन नहीं रहे
- Afkar Alvi
अपने
भी
तुझ
को
अपनों
में
अब
गिन
नहीं
रहे
'अफ़कार'
मान
जा
कि
तेरे
दिन
नहीं
रहे
- Afkar Alvi
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मैं
तुम्हें
बद्दुआएं
देता
हूँ
ताकि
तुम
मेरा
दर्द
जान
सको
तुम
जिसे
चाहते
हो
मर
जाए
और
तुम
उसके
बाद
ज़िंदा
रहो
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Afkar Alvi
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फिर
एक
रोज़
मुक़द्दर
से
हार
मानी
गई
ज़बीन
चूम
के
बोला
गया
"ख़ुदा
हाफ़िज़"
Afkar Alvi
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जो
भी
इज़्ज़त
के
डर
से
डर
जाए
मत
करे
इश्क़
अपने
घर
जाए
बात
आ
जाए
जब
दु'आओं
पर
इस
सेे
बेहतर
है
बंदा
मर
जाए
थोड़ी
सी
और
देर
सामने
रह
मेरी
आँखों
का
पेट
भर
जाए
अल-मुहैमिन
के
घर
भी
ख़तरे
हैं
जाए
भी
तो
कोई
किधर
जाए
हाँ
अकीदा
अगर
न
क़ैद
रखे
फिर
तो
इंसान
कुछ
भी
कर
जाए
बेबसी
की
ये
आख़िरी
हद
है
मेरी
औलाद
आप
पर
जाए
उसके
चेहरे
पर
आज
उदासी
थी
हाए
'अफ़्कार
अल्वी'
मर
जाए
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Afkar Alvi
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चारपाई
पे
आ
उतारी
है
ज़िन्दगी
ज़िंदा
लाश
भारी
है
आप
दुख
दे
रहे
है
रो
रहा
हुँ
और
ये
फिलहाल
जारी
है
रोना
लिखा
गया
रोते
है
जिम्मेदारी
तो
जिम्मेदारी
है
मेरी
मर्ज़ी
जहाँ
भी
सर्फ़
करु
ज़िन्दगी
मेरी
है,
तुम्हारी
है
दुश्मनी
के
हजारो
दर्जे
है
आख़िरी
दर्जा
रिशतादारी
है
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Afkar Alvi
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तर्जुबा
था
सो
दु'आ
की
के
नुकसान
ना
हो
इश्क़
मजदूर
को
मजदूरी
के
दौरान
ना
हो
मैं
उसे
देख
ना
पाता
था
परेशानी
में
सो
दु'आ
करता
था
मर
जाए
परेशान
ना
हो
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Afkar Alvi
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