nazar kii kashf-o-karamaat hi alag hai yaar | नज़र की कश्फ़-ओ-करामात ही अलग है यार

  - Prashant Kumar
नज़रकीकश्फ़-ओ-करामातहीअलगहैयार
किहुस्नवालोंकीतोबातहीअलगहैयार
मिरीगलीमेंसब'आशिक़पकड़लिएजाते
मगरतुम्हारीमुलाक़ातहीअलगहैयार
कोईभीयारत'अज्जुबहैभीगताहीनहीं
तिरेइधरकीतोबरसातहीअलगहैयार
जहाँमेंकौनबचाहैनिगाहसेतिरछी
तिरीनिगाहकीतोबातहीअलगहैयार
बदलरहेहैंक़बाएँदरख़्तसावनमें
इधरकामौसम-ए-बरसातहीअलगहैयार
हकीमनब्ज़मिरीढूँढतेरहेमिली
यहीकहाकितिराहाथहीअलगहैयार
बहुतहुएहैंसुख़न-वरजहानमेंयूँँतो
मगर'प्रशांत'कीतोबातहीअलगहैयार
  - Prashant Kumar
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy