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Vishnu Dope
toot ke phir bikhar gaya hooñ main
toot ke phir bikhar gaya hooñ main | टूट के फिर बिखर गया हूँ मैं
- Vishnu Dope
टूट
के
फिर
बिखर
गया
हूँ
मैं
अपनों
पे
ही
बिफर
गया
हूँ
मैं
पास
थे
जिनके
दूर
से
भी
हम
दूर
हैं
जब
से
घर
गया
हूँ
मैं
घर
चलाते
चलाते
फिर
इक
दिन
घर
को
अपने
निघर
गया
हूँ
मैं
ज़िंदगी
बोझ
ही
रही
मुझपे
देखो
ना
दब
के
मर
गया
हूँ
मैं
इक
बली
तो
चढ़ानी
ही
थी
मुझे
अपनी
ज़ुल्फ़ें
कतर
गया
हूँ
मैं
जुर्म
ही
तो
रहा
मिरे
सर
पे
जबकि
अपने
ही
सर
गया
हूँ
मैं
दाग़
ही
तो
लगाया
है
ख़ुद
पे
दाग़
से
ही
सँवर
गया
हूँ
मैं
मैंने
देखा
कि
लोग
सुनते
भी
है
बज़्म
से
भर-नज़र
गया
हूँ
मैं
मैं
लिखूँ
आज
दायरे
में
क्यूँँ
जबकि
कब
का
पसर
गया
हूँ
मैं
मैं
ही
तो
हद
हूँ
मेरी
राहों
का
आज
ख़ुद
से
गुज़र
गया
हूँ
मैं
- Vishnu Dope
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बड़ी
पेश-बीनी
से
मैं
शहर
आ
के
भला
खिड़की
से
खिड़कियाँ
देखता
हूँ
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इतना
ही
याद
रहता
है
बस
बारहा
भूल
जाता
हूँ
मैं
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आज
फिर
दिल
ने
तमाशा
कर
दिया
इक
जुनूँ
को
फिर
हताशा
कर
दिया
क्या
नफ़ा
है
कौन
है
नुक़सान-देह
मैंने
हर
हासिल
को
बाशा
कर
दिया
लुत्फ़
ख़ुश-फ़हमी
का
लेना
था
मगर
ये
ख़ता
भी
बेतहाशा
कर
दिया
ज़िंदगी
ज़ौक़-ए-तमाशा
बन
गई
ख़्वाब
ने
दिल
को
बताशा
कर
दिया
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आज
तो
आग
लगाए
कोई
ढूँढे
परवाना
सराए
कोई
आज
निय्यत
है
बड़ी
ही
ज़ालिम
दाग़
बे-लाग
लगाए
कोई
शौक़
हमको
है
नशे
का
साक़ी
आँखों
से
भी
तो
पिलाए
कोई
याद
आसानी
से
आ
जाते
हैं
जो
जतन
करके
भुलाए
कोई
दर
बदर
ख़ाक
बसर
करता
हूॅं
काश
मंज़िल
भी
बताए
कोई
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क़सम
खाना
वफ़ादारी
जताने
का
सलीक़ा
है
भरोसा
हो
न
हो
आराम
थोड़ा
हो
ही
जाता
है
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