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Ajeetendra Aazi Tamaam
aaj dekha hamne us ko gair ki aaghosh men
aaj dekha hamne us ko gair ki aaghosh men | आज देखा हमने उस को ग़ैर की आग़ोश में
- Ajeetendra Aazi Tamaam
आज
देखा
हमने
उस
को
ग़ैर
की
आग़ोश
में
हम
सेे
जिस
ने
कल
कहा
कुछ
दिन
अकेला
छोड़
दो
- Ajeetendra Aazi Tamaam
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जिसे
जो
जी
में
आता
है
सो
लिखता
है
बड़ा
मुश्किल
है
कह
पाना
क़लम
का
दुख
Harsh saxena
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जो
सावन
होते
सूखा,
उस
फूल
पे
लानत
हो
मुझ
पे
लानत,
तेरे
होते,
यार
उदासी
है
Siddharth Saaz
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शहर
का
तब्दील
होना
शाद
रहना
और
उदास
रौनक़ें
जितनी
यहाँ
हैं
औरतों
के
दम
से
हैं
Muneer Niyazi
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दुख
की
दीमक
अगर
नहीं
लगती
ज़िन्दगी
किस
क़द्र
हसीं
लगती
वस्ल
को
लॉटरी
समझता
हूँ
लॉटरी
रोज़
तो
नहीं
लगती
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Azbar Safeer
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उम्र
भर
मेरी
उदासी
के
लिए
काफ़ी
है
जो
सबब
मेरी
ख़मोशी
के
लिए
काफ़ी
है
जान
दे
देंगे
अगर
आप
कहेंगे
हम
सेे
जान
देना
ही
मु'आफ़ी
के
लिए
काफ़ी
है
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Aakash Giri
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पत्थर
दिल
के
आँसू
ऐसे
बहते
हैं
जैसे
इक
पर्वत
से
नदी
निकलती
है
Shobhit Dixit
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शाम
भी
थी
धुआँ
धुआँ
हुस्न
भी
था
उदास
उदास
दिल
को
कई
कहानियाँ
याद
सी
आ
के
रह
गईं
Firaq Gorakhpuri
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सुखा
ली
सबने
ही
आँखें
हवा
ए
ज़िन्दगी
से
यहाँ
अब
भी
वही
रोना
रुलाना
चल
रहा
है
Farhat Ehsaas
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कोई
हादसा
लेकर
आदमी
किधर
जाए
आदमी
अगर
कह
दे
हादसा
उदासी
है
Rohit tewatia 'Ishq'
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यूँँ
ही
थोड़ी
मेरी
गज़लों
में
इतना
दुख
होता
है
इस
दुनिया
ने
हम
लड़कों
से
रोने
का
हक़
छीना
है
Harsh saxena
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ज़माना
मर्द
होता
जा
रहा
है
बहुत
बेदर्द
होता
जा
रहा
है
फिर
इक
सफ़हा
किताब-ए-ज़िंदगी
का
वो
देखो
गर्द
होता
जा
रहा
है
नहीं
बच
पायेगा
ये
साल
भी
अब
दिसंबर
सर्द
होता
जा
रहा
है
गिरेगा
टूट
कर
जल्दी
शजर
से
ये
पत्ता
ज़र्द
होता
जा
रहा
है
बनेगा
दर्द
का
कारण
किसी
दिन
वो
जो
हमदर्द
होता
जा
रहा
है
उठो
जागो
मिटा
दो
बेबसी
को
बहुत
सरदर्द
होता
जा
रहा
है
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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इक
हुस्न-ए-क़त्ल-ए-आम
को
कितना
ग़ुरूर
है
बेखौफ़
बोलता
है
कि
वो
बे-क़ुसूर
है
Ajeetendra Aazi Tamaam
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अपनी
कि़स्मत
में
ही
जब
इश्क़
नहीं
है
यारो
किसलिए
अश्क-ए-लहू
इश्क़
में
जाया
करना
Ajeetendra Aazi Tamaam
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आपके
दिल
पर
निशाँ
कुछ
और
हैं
दिल
के
पन्नों
पर
निशानी
और
है
Ajeetendra Aazi Tamaam
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इक
लड़की
जो
मुझ
सेे
लंबी
है
मुझको
वो
अच्छी
लगती
है
उसको
भी
इंट्रेस्ट
है
मुझ
में
लोगों
की
परवाह
करती
है
कितना
शर्माती
है
देखो
नज़रों
से
ओझल
रहती
है
खोयी
खोयी
सी
लगती
है
पागल
सी
दीवानी
सी
है
नाम
नहीं
लेती
मेरा
वो
देखो
तो
कितनी
पगली
है
दूर
से
कहती
है
ओ
मजनू
पास
आने
से
घबराती
है
बात
नहीं
करती
मुझ
सेे
वो
कुछ
भी
पूछूँ
हँस
देती
है
सुलझाती
है
सबके
मैटर
ख़ुद
इक
अनसुलझी
गुत्थी
है
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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