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Adv Aaves Shaikh
maut ke paas kar rahi bhi hai
maut ke paas kar rahi bhi hai | मौत के पास कर रही भी है
- Adv Aaves Shaikh
मौत
के
पास
कर
रही
भी
है
और
वही
मेरी
ज़िंदगी
भी
है
उसके
होंठों
पे
मुस्कुराहट
है
उसकी
आँखों
में
इक
नमी
भी
है
उसके
दिल
में
बहुत
सी
बातें
हैं
और
होंठों
पे
ख़ामुशी
भी
है
उसकी
आँखों
के
सामने
हो
तो
मेरी
तस्वीर
बोलती
भी
है
पहले
रख
कर
के
भूलती
है
मुझे
बाद
में
मुझको
ढूँढती
भी
है
इस
जहाँ
के
घने
अँधेरे
में
उसके
होने
से
रौशनी
भी
है
शर्त
ये
भी
कि
ज़िन्दा
रहना
है
हिज्र
की
रात
काटनी
भी
है
सोचता
हूँ
कि
अब
भुला
दूँ
उसे
मेरी
रग
रग
में
वो
बसी
भी
हैं
दर्द-ए-दिल
की
अहम
दवाओं
में
इक
दवाई
ये
शा'इरी
भी
है
- Adv Aaves Shaikh
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल
तो
जुस्तुजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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पास
मैं
जिसके
हूँ
वो
फिर
भी,
अच्छा
लड़का
ढूँढ़
रही
है
उसने
लगा
रक्खा
है
चश्मा,
और
वो
चश्मा
ढूँढ़
रही
है
फ़ोन
किया
मैंने
और
पूछा,
अब
तक
घर
से
क्यूँँ
नहीं
निकली
उस
ने
कहा
मुझ
सेे
मिलने
का,
एक
बहाना
ढूँढ़
रही
है
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Tanoj Dadhich
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अब
उसकी
शादी
का
क़िस्सा
न
छेड़ो
बस
इतना
कह
दो
कैसी
लग
रही
थी
Zubair Ali Tabish
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इश्क़
अगर
बढ़ता
है
तो
फिर
झगड़े
भी
तो
बढ़ते
हैं
आमदनी
जब
बढ़ती
है
तो
ख़र्चे
भी
तो
बढ़ते
हैं
माना
मंज़िल
नहीं
मिली
है
हमको
लेकिन
रोज़ाना
एक
क़दम
उसकी
जानिब
हम
आगे
भी
तो
बढ़ते
हैं
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Tanoj Dadhich
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वो
राही
हूँ
पलभर
के
लिए,
जो
ज़ुल्फ़
के
साए
में
ठहरा,
अब
ले
के
चल
दूर
कहीं,
ऐ
इश्क़
मेरे
बेदाग
मुझे
।
Raja Mehdi Ali Khan
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उन्हीं
रास्तों
ने
जिन
पर
कभी
तुम
थे
साथ
मेरे
मुझे
रोक
रोक
पूछा
तिरा
हम-सफ़र
कहाँ
है
Bashir Badr
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सिवा
इसके
कुछ
अच्छा
ही
नहीं
लगता
है
शामों
में
सफ़र
कैसा
भी
हो
घर
को
परिंदे
लौट
जाते
हैं
Aarush Sarkaar
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ज़हीफ़ी
इस
लिए
मुझको
सुहानी
लग
रही
है
इसे
कमाने
में
पूरी
जवानी
लग
रही
है
नतीजा
ये
है
कि
बरसों
तलाश-ए-ज़ात
के
बाद
वहाँ
खड़ा
हूँ
जहाँ
रेत
पानी
लग
रही
है
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Khalid Sajjad
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ज़िंदगी
यूँँ
हुई
बसर
तन्हा
क़ाफ़िला
साथ
और
सफ़र
तन्हा
Gulzar
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ग़ुबार-ए-वक़्त
में
अब
किस
को
खो
रही
हूँ
मैं
ये
बारिशों
का
है
मौसम
कि
रो
रही
हूँ
मैं
Shahnaz Parveen Sahar
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तेरा
हर
रूप
जानता
हूँ
मगर
क्या
करूँँ
तुझ
सेे
प्यार
करता
हूँ
Adv Aaves Shaikh
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मेरी
दुश्मन
ये
वकालत
निकली
प्यार
के
ख़त
को
वो
नोटिस
समझे
Adv Aaves Shaikh
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तुम
जीते
और
मैं
हारा
मैं
हारा
और
तुम
जीते
तुमने
यह
सब
झूठ
सुना
हो
ऐसा
भी
हो
सकता
है
Adv Aaves Shaikh
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मैं
उसको
मुख़्तलिफ़
समझा
था
'आवेस'
मगर
फिर
वो
भी
दुनिया
हो
गई
थी
Adv Aaves Shaikh
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मेरी
जीने
की
ख़्वाहिश
मर
रही
थी
वो
जब
बैगों
में
कपड़े
भर
रही
थी
अगर
इतना
बुरा
था
इतने
बरसों
वो
मेरे
साथ
में
क्या
कर
रही
थी
दवा
देती
थी
पर
मैं
जानता
था
वो
मेरे
साथ
में
क्या
कर
रही
थी
मेरे
ही
सामने
मेरी
हक़ीक़त
मेरे
ख़्वाबों
का
सौदा
कर
रही
थी
उसे
करता
था
मैं
पर्दे
की
तनक़ीद
वो
अब
मुझ
से
भी
पर्दा
कर
रही
थी
बड़ी
मेहनत
से
जो
कश्ती
बनाई
वो
अब
मुझ
से
किनारा
कर
रही
थी
चलो
माना
दिए
ने
ख़ुद-कुशी
की
हवा
ताक
में
क्या
कर
रही
थी
सड़क
के
मोड़
पर
नन्ही
सी
गुड़िया
गिरा
खाना
इकट्ठा
कर
रही
थी
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Adv Aaves Shaikh
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