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Aatish Indori
dheere dheere se jal rahe hain ham
धीरे-धीरे से जल रहे हैं हम
- Aatish Indori
धीरे-धीरे
से
जल
रहे
हैं
हम
मौत
की
ओर
चल
रहे
हैं
हम
दूर
रहिए
उबल
रहे
हैं
हम
आजकल
सच
उगल
रहे
हैं
हम
हम
मिलेंगे
तुम्हें
किताबों
में
ढेर-अभावों
में
पल
रहे
हैं
हम
ज़िंदगी
अपना
लेना
अब
हमको
तेरे
साँचे
में
ढल
रहे
हैं
हम
भूक
इतनी
बड़ी
कि
आलम
है
ख़ुद
ही
ख़ुद
को
निगल
रहे
हैं
हम
दूर
से
ही
सलाम
कर
लेना
आइना
बन
टहल
रहे
हैं
हम
- Aatish Indori
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जो
हल
सोचा
था
वो
निकाला
गया
है
कई
बार
सिक्का
उछाला
गया
है
मेरे
शे'र
ख़ारिज
हुये
एक
मुद्दत
समुंदर
से
गौहर
निकाला
गया
है
यहाँ
लड़कियाँ
दो
हैं
और
एक
चॉइस
मुझे
सिक्के
जैसा
उछाला
गया
है
वहाँ
रोशनी
की
ज़रूरत
है
आतिश
जहाँ
से
ये
पत्थर
उछाला
गया
है
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हमारे
हौसलों
को
पाँव
देते
हैं
पिता
धूप
ओढ़ते
हैं
छाँव
देते
हैं
तुम्हारे
शहर
में
ये
मसअला
होगा
हमारे
गाँव
में
सब
छाँव
देते
हैं
ये
दुनिया
तो
बना
देती
है
घनचक्कर
जिनालय
और
शिवालय
ठाँव
देते
हैं
इसी
लालच
से
आँगन
में
जगह
दे
दो
बड़े
बूढ़े
घनेरी
छाँव
देते
हैं
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Aatish Indori
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काम
जान-ए-जाँ
को
जो
आता
है
वो
भी
करती
है
मैं
वफ़ा
करता
हूँ
तो
वो
बेवफ़ाई
करती
है
Aatish Indori
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न
ही
लैला
न
ही
मजनूँ
मुहब्बत
में
शराफ़त
कौन
करता
है
मुहब्बत
का
ख़ज़ाना
लूटते
हैं
सब
क़ना'अत
कौन
करता
हैं
Aatish Indori
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गर
वो
दरिया
नहीं
तो
तय
है
समुंदर
होगा
दर्द
आँखों
में
नहीं
तो
कहीं
भीतर
होगा
बाहरी
रूप
अलग
अस्ल
तो
भीतर
होगा
प्यास
बुझती
नहीं
तो
तय
है
समुंदर
होगा
कोई
मायावी
नहीं
है
न
कोई
बाज़ीगर
जीत
कर
हार
रहा
है
तो
सिकंदर
होगा
दूसरा
ख़ुश
है
तो
वो
ख़ुश
है
यूँँ
तबियत
होगी
प्यार
जो
करता
है
वो
मस्त
क़लंदर
होगा
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Aatish Indori
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