main shehr-e-tamanna ki taaraaj nagri ke malbe men | मैं शहर-ए-तमन्ना की ताराज नगरी के मलबे में

  - Aarif Akhtar Naqvi
मैंशहर-ए-तमन्नाकीताराजनगरीकेमलबेमें
लाचार-ओ-तन्हा
कभीइसखंडरपरकभीउसखंडरतक
भटकताहुआ
ढूँडताफिररहाहूँ
अपनेमासूममिस्मारख़्वाबोंकामलबा
तभीइकतरफ़कोनज़रजोगईतोदिखाईदिया
टूटेफूटेजलाएगएकुछमकाँ
एकमीनार-ए-मस्जिद
कलशएकमंदिरकाऔंधापड़ाहै
कुरेदातोमलबेकेनीचेमेराख़्वाब
साँझीविरासतकाएकसाज़भीदफ़्नथा
मुझेयादआया
मेरेअम्माँअब्बानेइससाज़पर
कितनेउल्फ़तकेनग़्मेंबजाकरसिखाएथेहमको
जवानीमें
इससाज़कीनर्मदिलकशधुनोंपर
बड़ेजोशऔरहौसलेसे
तरानेमोहब्बतकेगायथेहमने
मगरफिर
रूह-परवरअज़ानोंकीआवाज़
औरमंदिरोंकेभजन
दिलकशीभूलकर
अपनेग़लबेकाएलानबनतेगए
शोरइतनाबढ़ा
साज़-ए-उल्फ़तकीआवाज़भीदबगई
शोरसेजोशबढ़तागया
होशजातारहा
औरफिरयेहुआ
आजशहर-ए-तमन्नाकीहालतहैजो
जिसतरफ़देखिएराखहीराखहै
औरमैं
अपनीमीरासको
अपनीसाँझीविरासतकेटूटेहुएसाज़को
अपनेदिलसेलगाए
दिल-शिकस्ता-ओ-गिर्यांखड़ाहूँ
क्याकरूँँ
इसकोमलबेमेंहीदफ़्नकरदूँ
मुझसेयेतोनहींहोगा
ऐसाकरताहूँटूटेहुएसाज़को
अपनीऔलादकोसौंपदूँ
बसइसीआसपर
इसीउम्मीदमें
मेरेबच्चेफिरउससाज़कोजोड़कर
गीतउल्फ़तकेफिरगुनगुनानेलगें
नफ़रतोंकोमिटानेलगें
काशयेहोसके
  - Aarif Akhtar Naqvi
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Chehra Shayari

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