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Shubham Rai 'shubh'
KHud se ho be-KHabar dar dar bhatkte hain
KHud se ho be-KHabar dar dar bhatkte hain | ख़ुद से हो बे-ख़बर दर दर भटकते हैं
- Shubham Rai 'shubh'
ख़ुद
से
हो
बे-ख़बर
दर
दर
भटकते
हैं
ऐसे
फ़कीर
हम
जो
घर
भटकते
हैं
ख़ुद
से
मिला
करो
कोई
बहाने
से
ख़ुद-आगही
के
कारण
डर
भटकते
हैं
- Shubham Rai 'shubh'
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गर
बाज़ी
इश्क़
की
बाज़ी
है,
जो
चाहो
लगा
दो
डर
कैसा
गर
जीत
गए
तो
क्या
कहना,
हारे
भी
तो
बाज़ी
मात
नहीं
Faiz Ahmad Faiz
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इस
दर
का
हो
या
उस
दर
का
हर
पत्थर
पत्थर
है
लेकिन
कुछ
ने
मेरा
सर
फोड़ा
हैं
कुछ
पर
मैं
ने
सर
फोड़ा
है
Zubair Ali Tabish
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हम
वो
हैं
जो
नइँ
डरते
वक़्त
के
इम्तिहान
से
वो
परिंदे
और
थे
जो
डर
गए
आसमान
से
Madhav
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दर-ब-दर
ढूँढ़
रहे
हैं
जिसे
अरसे
से
हम
शख़्स
वो
मेरी
ही
आँखों
में
छिपा
बैठा
है
Harsh saxena
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ज़ात
दर
ज़ात
हम
सेफ़र
रहकर
अजनबी
अजनबी
को
भूल
गया
Jaun Elia
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गुज़ार
देते
हैं
रातें
पहलू
में
उसके
जुगनू
को
भी
दर
का
फ़क़ीर
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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मैं
कैसे
मान
लूँ
कि
इश्क़
बस
इक
बार
होता
है
तुझे
जितनी
दफ़ा
देखूँ
मुझे
हर
बार
होता
है
तुझे
पाने
की
हसरत
और
डर
ना-कामियाबी
का
इन्हीं
दो
तीन
बातों
से
ये
दिल
दो
चार
होता
है
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Bhaskar Shukla
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रातें
किसी
याद
में
कटती
हैं
और
दिन
दफ़्तर
खा
जाता
है
दिल
जीने
पर
माएल
होता
है
तो
मौत
का
डर
खा
जाता
है
सच
पूछो
तो
'तहज़ीब
हाफ़ी'
मैं
ऐसे
दोस्त
से
आज़िज़
हूँ
मिलता
है
तो
बात
नहीं
करता
और
फोन
पे
सर
खा
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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हम
मिल
के
आ
गए
मगर
अच्छा
नहीं
लगा
फिर
यूँँ
हुआ
असर
कि
घर
अच्छा
नहीं
लगा
इक
बार
दिल
में
तुझ
सेे
जुदाई
का
डर
बना
फिर
दूसरा
कोई
भी
डर
अच्छा
नहीं
लगा
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Shriyansh Qaabiz
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कहानी
तुम्हारी
है
हीरो
हो
तुम
कहाँ
कह
रहे
हम
कि
ज़ीरो
हो
तुम
Shubham Rai 'shubh'
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फँसी
कश्ती
हमारी
है
दुखों
का
बोझ
भारी
है
सँभल
कर
चल
रहा
हूँ
जो
दया
गिरधर
तुम्हारी
है
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Shubham Rai 'shubh'
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इक
कहानी
में
पहले
सँवारा
गया
उस
कहानी
में
फिर
मुझको
मारा
गया
दर्द
भी
बाँटते
हम
किसी
से
मगर
बीच
अपनों
के
सिर
को
उतारा
गया
आप
मन्नत
किए
टूटते
देखकर
है
मिरा
दुख
किसी
घर
का
तारा
गया
घर
को
सहरा
समझते
रहे
उन
दिनों
गाँव
छूटा
लगा
वक़्त
प्यारा
गया
जुगनू
लेकर
भटकते
रहे
दर-ब-दर
शम्स
की
खोज
में
चाँद
तारा
गया
एक
मोती
मगर
हाथ
आया
नहीं
हाथ
से
भी
निकल
अब
किनारा
गया
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Shubham Rai 'shubh'
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बीतता
वक़्त
इक
ख़जाना
है
क्या
नया
साल
क्या
पुराना
है
Shubham Rai 'shubh'
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सवाल
क्या
है
जवाब
क्या
है
खुले
न
आँखें
तो
ख़्वाब
क्या
है
ज़बाँ
सही
है
अगर
तुम्हारी
तू
ही
बता
फिर
ख़राब
क्या
है
मिटेंगे
हम
तो
मिटोगे
तुम
भी
या
पूछ
राह-ए-सवाब
क्या
है
सफ़र
में
जिनके
भरे
हों
काँटें
जा
पूछ
उन
सेे
गुलाब
क्या
है
मिले
जो
इज़्ज़त
बिना
ख़रीदे
तो
इस
सेे
ज़्यादा
निसाब
क्या
है
रहे
सलामत
जो
दोस्ताना
बड़ा
जहाँ
में
ख़िताब
क्या
है
रहे
ये
जीवन
जो
निष्कलंकित
तो
इस
सेे
बढ़िया
किताब
क्या
है
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