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Prince
ab ki itnaa bhi sach na bolo tum
ab ki itnaa bhi sach na bolo tum | अब कि इतना भी सच न बोलो तुम
- Prince
अब
कि
इतना
भी
सच
न
बोलो
तुम
कि
ज़ुबाँ
से
कोई
छुरे
लगो
तुम
और
बहुत
ज़्यादा
अच्छे
भी
न
बनो
कि
सभी
को
बहुत
बुरे
लगो
तुम
- Prince
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झूट
वाले
कहीं
से
कहीं
बढ़
गए
और
मैं
था
कि
सच
बोलता
रह
गया
Waseem Barelvi
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ये
सच
है
कि
पाँवों
ने
बहुत
कष्ट
उठाए
पर
पाँव
किसी
तरह
राहों
पे
तो
आए
Dushyant Kumar
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तुम्हें
हम
भी
सताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
तुम्हारा
दिल
दुखाने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
हमें
बदनाम
करते
फिर
रहे
हो
अपनी
महफ़िल
में
अगर
हम
सच
बताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
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Santosh S Singh
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ख़ुशरंग
नज़र
आता
है
जाज़िब
नहीं
लगता
माहौल
मेरे
दिल
से
मुख़ातिब
नहीं
लगता
मैं
भी
नहीं
हर
शे'र
में
मौजूद
ये
सच
है
ग़ालिब
भी
हर
इक
शे'र
में
ग़ालिब
नहीं
लगता
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Obaid Azam Azmi
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वो
कहते
हैं
मैं
ज़िंदगानी
हूँ
तेरी
ये
सच
है
तो
उन
का
भरोसा
नहीं
है
Aasi Ghazipuri
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मैं
सच
कहूँगी
मगर
फिर
भी
हार
जाऊँगी
वो
झूट
बोलेगा
और
ला-जवाब
कर
देगा
Parveen Shakir
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सच
तो
ये
है
'मजाज़'
की
दुनिया
हुस्न
और
इश्क़
के
सिवा
क्या
है
Asrar Ul Haq Majaz
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ये
नहीं
है
कि
वो
एहसान
बहुत
करता
है
अपने
एहसान
का
एलान
बहुत
करता
है
आप
इस
बात
को
सच
ही
न
समझ
लीजिएगा
वो
मेरी
जान
मेरी
जान
बहुत
करता
है
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Jawwad Sheikh
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सच
की
डगर
पे
जब
भी
रक्खे
क़दम
किसी
ने
पहले
तो
देखी
ग़ुर्बत
फिर
तख़्त-ओ-ताज
देखा
Amaan Pathan
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कुछ
रिश्तों
में
दिल
को
आज़ादी
नइँ
होती
कुछ
कमरों
में
रौशनदान
नहीं
होता
है
Vikram Gaur Vairagi
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हम
तेरे
फ़िराक़
में
जिए
तो
यह
पता
चला
मेरी
जान
मरना
आसाँ
था
बहुत
यूँँ
जीने
से
Prince
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कई
और
भी
राहें
जाती
थी
मंज़िल
को
यारों
मगर
हम
ही
उसकी
गली
में
से
होकर
के
निकले
Prince
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तेरा
बुत
तो
नहीं
था
पास
मेरे,
तेरी
यादों
को
अपने
पास
रखा
गोया
हस्ते
हुए
भी
हमने
सदा,
अपने
दिल
को
बहुत
उदास
रखा
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Prince
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मुझे
तुम
पूछते
हो
प्यार
क्या
है
बता
आख़िर
बला
ये
यार
क्या
है
कि
सारी
देखने
की
बात
है
बस
भला
गुल
और
फिर
यह
खा़र
क्या
है
कि
ख़ुदको
ज़र्फ़
वाला
मानते
हो,
बता
यह
पीठ
पर
फिर
वार
क्या
है
बता
कब
देखता
है
इश्क़
हालत,
भला
मुश्ताक़
या
बेज़ार
क्या
है
कहा
था
याद
आओगे
न
तुम
फिर,
ये
दिल
में
यार
हाहाकार
क्या
है
कि
ख़ुद
ही
कर
खफ़ा
वो
प्रिंस
हमको
वो
ख़ुद
ही
पूछते
हैं
सार
क्या
है
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ये
सूखी
आँखें
मेरी
नम
न
हो
जाएँ
कहीं
इस
बुत
में
साँसे
कम
न
हो
जाए
कहाँ
है
तू
मुझे
फिर
ज़ख़्म
दे
आकर
कहीं
ये
दर्द
मेरे
कम
न
हो
जाए
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