jahaan ki laanato aur thokron ko khaate hue | जहाँ की लानतो और ठोकरों को खाते हुए

  - Mohammad Aquib Khan
जहाँकीलानतोऔरठोकरोंकोखातेहुए
बितादीज़िन्दगीमैंनेतुझेनिभातेहुए
मैंबादहिज्रकेदरियामेंइसलिएडूबा
कहींनादेखलेआँसूकोईबहातेहुए
बसारहाहैनयाशहरज़ोरोंशोरोंसे
वोथकगयाहैवहीबस्तियांजलातेहुए
थीयारदोस्तकीमहफ़िलहसींठिठोलीथी
मैंरोपड़ाथामगरकहकहालगातेहुए
कुछइसलिएभीसुब्हअपनीरेलछूटगई
वोसोगयाथामुझेलोरियाँसुनातेहुए
ग़ज़लयेऐसेनहींबनगईमेरी'आक़िब'
लहूजलाहैबहुतक़ाफ़ियामिलातेहुए
  - Mohammad Aquib Khan
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