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Zain Aalamgir
khwaab hone lage sabhi ke sach
khwaab hone lage sabhi ke sach | ख़्वाब होने लगे सभी के सच
- Zain Aalamgir
ख़्वाब
होने
लगे
सभी
के
सच
मुस्कुराना
शुरू
किया
तुमने
- Zain Aalamgir
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मेरे
भी
दिल
में
राख
उड़ती
है
तेरे
भी
ख़्वाब
इस
असर
में
हैं
Nusrat Zehra
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आरज़ू'
जाम
लो
झिजक
कैसी
पी
लो
और
दहशत-ए-गुनाह
गई
Arzoo Lakhnavi
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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तूने
देखी
है
वो
पेशानी
वो
रुख़्सार
वो
होंठ
ज़िंदगी
जिनके
तसव्वुर
में
लुटा
दी
हमने
तुझपे
उठी
हैं
वो
खोई
हुई
साहिर
आँखें
तुझको
मालूम
है
क्यूँ
उम्र
गंवा
दी
हमने
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Faiz Ahmad Faiz
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गुलाब
ख़्वाब
दवा
ज़हर
जाम
क्या
क्या
है
मैं
आ
गया
हूँ
बता
इंतिज़ाम
क्या
क्या
है
Rahat Indori
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भरे
हुए
जाम
पर
सुराही
का
सर
झुका
तो
बुरा
लगेगा
जिसे
तेरी
आरज़ू
नहीं
तू
उसे
मिला
तो
बुरा
लगेगा
ये
आख़िरी
कंपकंपाता
जुमला
कि
इस
तअ'ल्लुक़
को
ख़त्म
कर
दो
बड़े
जतन
से
कहा
है
उस
ने
नहीं
किया
तो
बुरा
लगेगा
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Zubair Ali Tabish
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गुज़र
रहा
हूँ
किसी
ख़्वाब
के
इलाक़े
से
ज़मीं
समेटे
हुए
आसमाँ
उठाए
हुए
Aziz Nabeel
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ऐ
शौक़-ए-नज़ारा
क्या
कहिए
नज़रों
में
कोई
सूरत
ही
नहीं
ऐ
ज़ौक़-ए-तसव्वुर
क्या
कीजे
हम
सूरत-ए-जानाँ
भूल
गए
Asrar Ul Haq Majaz
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ये
आरज़ू
भी
बड़ी
चीज़
है
मगर
हमदम
विसाल-ए-यार
फ़क़त
आरज़ू
की
बात
नहीं
Faiz Ahmad Faiz
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ऐसा
है
कि
सब
ख़्वाब
मुसलसल
नहीं
होते
जो
आज
तो
होते
हैं
मगर
कल
नहीं
होते
Ahmad Faraz
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हालतें
ये
क्या
कि
सब
हो
गए
परिंदे
तो
रिहा
पर
उस
रिहाई
बा'द
उड़ना
भूल
बैठे
ये
परिंदे
Zain Aalamgir
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लम्हा-ए-फुर्कत
टल
गया
होता
अगर
दिखता
जभी
मुड़
'ज़ैन'
तब
लम्हा-ए-चेहरा
ग़मज़दा
का
देखता
Zain Aalamgir
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है
हाथ
पकड़ा
शांत
सड़को
पर
सभी
अपना
यहाँ
खुदका
निभाने
साथ
पर
मैंने
किया
है
जो
अमल
Zain Aalamgir
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जानिब
चलू
मैं
रौशनी
के,
तीरगी
पीछा
करे
मैं
छोड़कर
तुझको
चलू
किस
सू,
कि
साया
पूछता
Zain Aalamgir
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यार
बूंदे-अश्क़
गिरने
से
ज़रा
पहले
तु
आना
मुंतज़िर
रख़
फिर
किनारा
ये
समुंदर
का
बनेगा
Zain Aalamgir
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