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ALI ZUHRI
yah gardan men jo zever pahne hain
yah gardan men jo zever pahne hain | यह गर्दन में जो ज़ेवर पहने हैं
- ALI ZUHRI
यह
गर्दन
में
जो
ज़ेवर
पहने
हैं
इनको
किसके
हाथों
खुलवाती
हो
- ALI ZUHRI
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इस
इश्क़
का
तो
चाल-चलन
ही
अजीब
है
जो
बे-वफ़ा
है,
दिल
भी
उसी
के
क़रीब
है
वो
बन
गया
नसीब
किसी
और
का
तो
क्या
वो
बन
सका
न
मेरा
ये
उसका
नसीब
है
वो
दोस्त
बोल
कर
जिसे
मिलवाया
करती
थी
अब
खुल
गया
है
राज़
वो
मेरा
रक़ीब
है
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ALI ZUHRI
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उसे
बनाया
गया
था
बहुत
हसीन
जमील
मैं
उस
सेे
इश्क़
न
करता
तो
और
क्या
करता
ALI ZUHRI
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सर-ए-बाज़ार
मैं
उसकी
मोहब्बत
को
न
बेचूँगा
किसी
नाज़ुक
परी
के
जिस्म
से
कपड़ा
न
खेचूँगा
ALI ZUHRI
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तो
अब
तुम
ही
कहो
जानाँ
मोहब्बत
छोड़
दूँ
कैसे
जो
मेरे
ग़म
की
साथी
है
वो
सिगरेट
तोड़
दूँ
कैसे
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ALI ZUHRI
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ये
ग़ज़ल
जब
भी
गुनगुनाता
हूँ
दर्द-ए-दिल
आपको
सुनाता
हूँ
अब
जुदाई
की
खाई
पर
अक्सर
उसके
ख़्वाबों
का
पुल
बनाता
हूँ
रात
भर
जागता
हूँ
ख़ुद
भी
और
उसकी
तस्वीर
भी
जगाता
हूँ
सर्द
राहों
पे
खोल
कर
तस्में
उसकी
जानिब
क़दम
बढ़ाता
हूँ
मैं
उसे
ढूँढने
की
कोशिश
में
अपना
ही
आप
भूल
जाता
हूँ
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ALI ZUHRI
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