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ALI ZUHRI
ya rab mujhko ab haq rastaa dikhla bhi de
ya rab mujhko ab haq rastaa dikhla bhi de | या रब मुझको अब हक़ रस्ता दिखला भी दे
- ALI ZUHRI
या
रब
मुझको
अब
हक़
रस्ता
दिखला
भी
दे
बे
मक़्सद
इंसाँ
को
इल्म-ए-रूहानी
दे
- ALI ZUHRI
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तुम्हारी
शक्ल
किसी
शक्ल
से
मिलाते
हुए
मैं
खो
गया
हूँ
नया
रास्ता
बनाते
हुए
Ashu Mishra
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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इश्क़
में
धोखा
खाने
वाले
बिल्कुल
भी
मायूस
न
हो
इस
रस्ते
में
थोड़ा
आगे
मयख़ाना
भी
आता
है
Darpan
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जो
तुम्हें
मंज़िल
पे
ले
जाएँगी
वो
राहें
अलग
हैं
मैं
वो
रस्ता
हूँ
कि
जिस
पर
तुम
भटक
कर
आ
गई
हो
Harman Dinesh
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तिरे
सिवा
भी
कहीं
थी
पनाह
भूल
गए
निकल
के
हम
तिरी
महफ़िल
से
राह
भूल
गए
Majrooh Sultanpuri
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हम
जान
से
जाएँगे
तभी
बात
बनेगी
तुम
से
तो
कोई
राह
निकाली
नहीं
जाती
Wasi Shah
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बाद
तेरे
नहीं
कोई
हमें
मंज़िल
की
तलब
हमने
सोचा
है
कि
हम
राह
भटक
जाएँगे
Prince
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सच
की
डगर
पे
जब
भी
रक्खे
क़दम
किसी
ने
पहले
तो
देखी
ग़ुर्बत
फिर
तख़्त-ओ-ताज
देखा
Amaan Pathan
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काम
की
बात
मैंने
की
ही
नहीं
ये
मेरा
तौर-ए-ज़िंदगी
ही
नहीं
Jaun Elia
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हर
तरफ़
उग
आए
हैं
जंगल
हमारी
हार
के
जीत
का
कोई
भी
रस्ता
अब
नहीं
दिखता
हमें
Siddharth Saaz
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आदमिय्यत
के
तक़ाज़ात
निभा
सकता
हूँ
तेरी
कश्ती
को
मैं
साहिल
से
लगा
सकता
हूँ
मैंने
समझा
है
तुझे
अपना
वजूद-ए-सानी
कैसे
मेयार
तेरा
दिल
से
गिरा
सकता
हूँ
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ALI ZUHRI
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अब
मोहब्बत
में
क्या
करे
कोई
ज़ख़्म-ए-दिल
को
सिला
करे
कोई
हुस्न
नामी
किसी
समुंदर
में
रेत
बन
के
बहा
करे
कोई
हाए
वो
इश्क़
का
असर
पहला
फूल
जैसे
खिला
करे
कोई
इश्क़
है
एक
फितना
ए
मलऊन
विर्द
लाहौल
का
करे
कोई
अपने
महबूब
को
ख़ुदा
कहकर
क्यूँँ
ख़ुदास
गिला
करे
कोई
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ALI ZUHRI
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कोई
सोचे
मोहब्बत
को
तो
क्या
सोचे
किसी
वीराने
में
जलता
दिया
सोचे
ALI ZUHRI
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उसके
आरिज़
पे
हैं
दोनो
जहान
माइल
उसने
हूरों
को
शैदाई
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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लब
हैं
जैसे
गुल
सुमबुल
रंग-ए-याक़ूती
ख़ुद
को
मैख़ाना
तितली
का
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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