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Waseem Siddharthnagari
Kuchh abhi kahna laa shaoori hai
कुछ अभी कहना ला-शऊरी है
- Waseem Siddharthnagari
कुछ
अभी
कहना
ला-शऊरी
है
कुछ
तो
कहना
मगर
ज़रूरी
है
कैसी
यारी
है
यार
अपनी
भी
पास
होते
हुए
भी
दूरी
है
ज़िंदगी
तुझ
से
ही
मुकम्मल
है
ज़िंदगी
बिन
तेरे
अधूरी
है
तख़्त
पाया
है
शे'र
से
लड़
कर
और
वो
शे'र
शाह
सूरी
है
बा-ख़बर
हो
के
ये
हुआ
मालूम
बेख़बर
रहना
भी
ज़रूरी
है
मौला
लख़्त-ए-जिगर
अता
कर
दे
तेरी
रहमत
बहुत
ज़रूरी
है
- Waseem Siddharthnagari
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चेहरे
से
ख़ुश-मिज़ाज
अदाकारी
ख़ास
है
वो
शख़्स
ग़म
में
मुब्तिला
है
यानी
ख़ास
है
वो
जब
तपाक
से
गले
मुझको
लगाएगी
मालूम
होगा
तब
उसे
वो
कितनी
ख़ास
है
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रब
की
उल्फ़त
फ़क़त
दाइमी
है
वरना
हर
एक
शय
आरज़ी
है
आरज़ू
है
उसे
भूल
जाऊँ
हाँ
मगर
आरज़ू
आरज़ी
है
मेरा
अपना
तआरुफ़
है
इतना
मैं
जो
कुछ
हूँ
मेरी
शा'इरी
है
तू
मुझे
भूल
बैठा
है
फिर
तो
मुझ
पे
भी
भूलना
लाज़मी
है
तेरे
दर
का
सवाली
हूँ
मौला
और
यही
कुल
मेरी
बंदगी
है
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Waseem Siddharthnagari
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कोई
पूछे
अगर
ये
ज़ीस्त
क्या
है
चराग़ों
को
हवा
की
ओर
कर
दो
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कौन
किस
पर
किस
तरह
करता
रहे
यूँँ
एतिबार
क्यूँ
कि
चेहरों
में
छुपा
हर
शख़्स
दिखता
है
मुझे
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मेरे
हिस्से
की
कोई
रौशनी
रखता
कैसे
मैं
तो
सूरज
की
तरह
तेज़
चमकता
भी
नहीं
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