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Vishakt ki Kalam se
KHvaab likh kar so gaya tha
KHvaab likh kar so gaya tha | ख़्वाब लिख कर सो गया था
- Vishakt ki Kalam se
ख़्वाब
लिख
कर
सो
गया
था
ख़्वाब
में
ही
खो
गया
था
ख़्वाब
पूरा
हो
न
पाया
ख़्वाब
में
जो
हो
गया
था
रो
नहीं
पाया
कभी
जो
ख़्वाब
में
वो
रो
गया
था
ऑंसुओ
से
आँख
धोई
पाप
अपने
धो
गया
था
बाक़ियों
की
ख़ैर
मुझ
सेे
पूछ
कर
वो
जो
गया
था
हाॅं
वही
तो
था
खिलाड़ी
खेल
दिल
से
जो
गया
था
जो
यहाॅं
काॅंटे
बिछे
हैं
बीज़
वो
ही
बो
गया
था
क्या
हुआ
जो
मर
गया
वो
ठीक
था
जब
वो
गया
था
ख़्वाब
पूरा
हो
तभी
वो
नींद
गहरी
सो
गया
था
- Vishakt ki Kalam se
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मुझे
जो
हाथ
दे
कर
तुम
गए
थे
नहीं
वो
हाथ
अब
लगता
तुम्हारा
किसी
से
यारियाँ
होंगी
तुम्हारी
तभी
तो
कर
लिया
हम
से
किनारा
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ज़रूरी
तो
नहीं
उसकी
हँसी
में
प्यार
ही
हो
हँसी
के
इस
जहाँ
में
और
भी
मतलब
बहुत
हैं
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तुम्हारी
सोच
में
मिलते
नहीं
हम
हमारी
बात
ही
कुछ
और
है
अब
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कभी
तू
भी
हमें
चाहे
हमें
तू
याद
कर
लें
कभी
तू
भी
भरे
दिल
को
खुला
आबाद
कर
लें
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डर
कमाना
जानता
हूँ
डर
छिपाना
जानता
हूँ
जानता
हूँ
कल
बुरा
है
पर
निभाना
जानता
हूँ
मैं
घिरा
हूँ
राख
से
पर
सब
जलाना
जानता
हूँ
जानता
हूँ
तेज़
मेरा
रोष
लाना
जानता
हूँ
आँख
से
मेरी
हवा
में
विष
मिलाना
जानता
हूँ
उड़
रहे
हैं
जो
गगन
में
बाज़
ढाना
जानता
हूँ
जानता
हूँ
बल
बढ़ाना
गिर
उड़ाना
जानता
हूँ
कौन
रोकेगा
मुझे
मैं
शव
खपाना
जानता
हूँ
जानता
हूँ
दव
बहाना
जल
जलाना
जानता
हूँ
नाम
में
विष
है
हमारे
मैं
बिसाना
जानता
हूँ
जीत
को
आदत
बनाकर
राज़
पाना
जानता
हूँ
जानता
हूँ
मैं
हक़ीक़त
मैं
फसाना
जानता
हूँ
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